नौ अंग्रेजीको शिक्षाका माध्यम बनाकर उसे जो बहुत ज्यादा अस्वाभाविक महत्व दे दिया गया था उसपर थी। अस्पृश्यताकी प्रथा नष्ट करने और जाति प्रथाको जिस हदतक वह संयमके पालन में सहायक हो उसी हद तक माननेके बारेमें भी उन्होंने इन दिनों काफी लिखा और कहा । अपनी इन विविध प्रवृत्तियोंमें गांधीजीके बल और उत्साहका अक्षय स्रोत उनकी ज्वलन्त भारत-भक्ति ही थी । " मैं अपना जीवन तभी सार्थक समझँगा जब भारतके लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर पाऊँ । ” ( पृष्ठ ४६ ) । देशमें उनका प्रभाव इस समय प्रकर्षपर था और इस अवसरका उपयोग करके वे उसे अपना सन्देश सुना डालनेके लिए बेचैन थे। किन्तु उन्हें भारतकी परिस्थितियोंके अपने सीमित अनुभवका भान था और राजनीतिके क्षेत्रमें वे अपने कदम काफी तोल-तोलकर ही बढ़ा रहे थे । गुजरात राजनीतिक परिषदकी अध्यक्षता करते हुए, ३ नवम्बर, १९१७ को अपने भाषण में उन्होंने कहा, "भारतके राजनीतिक क्षेत्रमें में अभी ढाई वर्षका बच्चा हूँ। मैं दक्षिण आफ्रिकाके अपने अनुभवसे यहाँ काम नहीं कर सकता।" (पृष्ठ ५०) फिर भी, उन्हें राजनीतिक क्षेत्रमें तो क्रियाशील रहना ही पड़ा । जब लॉर्ड माण्टेग्युने इसका कारण जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि अगर मैं राजनीतिसे हट जाऊँ तो अपने धार्मिक और सामाजिक दायित्व भी पूरा नहीं कर पाऊँगा । यह उत्तर उन्होंने काफी तौल कर दिया था, क्योंकि उनका खयाल था, "अपने जीवनके अन्त तक मेरा यही जवाब रहेगा ।" (पृष्ठ ४६१) देशकी घोर गरीबीका खयाल उन्हें रात दिन सालता रहता था और उनका यह दुःख तब और बढ़ जाता था जब वे देखते थे कि लोग उसका निवारण कर सकनेमें असहाय हैं । अन्य सभी क्षेत्रोंमें प्रगतिके लिए भी राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक थी, और इसीलिए गांधीजी चाहते थे कि देशको गलतियाँ करनेका अधिकार मिलना चाहिए । “जिसे भूलें करनेका हक न हो वह कभी उन्नति भी नहीं कर सकता... भूलें करनेका अधिकार और उन्हें सुधारनेकी सत्ता - यह स्वराज्यकी व्याख्या है।” (पृष्ठ ५५) स्वभावतः वे देशके लिए स्वराज्यकी प्राप्तिको मुख्य स्थान देते थे और उसकी तुलनामें अन्य सार्वजनिक प्रश्नों और प्रवृत्तियोंको उसके अधीन गौण स्थान देते थे । तदनुसार उन्होंने मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारोंका, स्वतंत्रताकी दिशामें एक कदमके रूपमें, स्वागत किया । खंडमें संकलित पत्रोंकी प्रचुरता इसकी एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता है। भारत और दक्षिण आफ्रिकाके अपने स्वजनों, सह-कार्यकर्ताओं और साथियोंको, तथा मित्रों, सार्वजनिक कार्यकर्त्ताओं, विद्वानों, सम्पादकों, विभिन्न स्तरोंके सरकारी अधिकारियों और विभिन्न विचारधाराओंके राजनीतिक व्यक्तियोंको लिखे गये इन पत्रोंमें, पाठक देखेंगे कि गांधीजी पत्रोंके प्रस्तुत विषयकी, राजनीतिक या अन्य सवालोंकी, चर्चा करके नहीं रह जाते; उनकी दिलचस्पी इस सीमाको लांघकर चुपचाप उन व्यक्तियोंके जीवनमें जा पहुँचती है- उसमें स्नेह और सहानुभूतिका मानवीय रंग आ मिलता है और यह पत्र-व्यवहार गोया शुद्ध मानवीय धरातलपर दो व्यक्तियोंके मिलनका आधार बन जाता है। उनके वैयक्तिक और राजनीतिक सम्पर्कोंका दायरा, जन-सेवाकी उनकी प्रवृत्ति ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है त्यों-त्यों व्यक्तियोंके रूपमें उन पुरुषों और स्त्रियोंके सम्बन्धमें उनकी कल्याण-चिन्ता अधिकाधिक गहरी और सक्रिय होती जाती है । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 14.pdf/१५
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