५२. वैष्णवोंसे वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीड पराई जाणे रे, परदुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आणे रे । सकल लोकमां सहुने वन्दे, निन्दा न करे केनी रे, वाच काछ मन निश्चल राखे, धन धन जननी तेरी रे । समदृष्टीने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे, जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे । मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे, रामनामशुं ताळी लागी, सकल तीरथ तेना तनमां रे । वणलोभीने कपट रहित छे, काम क्रोध निवार्या रे, भणे नरसैयो तेनुं दरसन करतां, कुळ एकोतेर तार्या रे । वै० नरसिंह मेहताने' वैष्णवके जो लक्षण बताये हैं उससे हम देखते हैं कि वह : १. परदुःख भंजक होता है । २. फिर भी निरभिमानी होता है । ३. सबकी वन्दना करता है । ४. किसीकी निन्दा नहीं करता । ५. वाचा दृढ़ रखता है । ६. आचार दृढ़ रखता है। ७. मन दृढ़ रखता है। ८. वह समदृष्टि होता है । ९. वह तृष्णारहित होता है । १०. एकपत्नीव्रत पालता है । ११. सत्यव्रत पालता है । १२. अस्तेय पालता है । १३. मायातीत होता है । १४. वीतरागी होता है । १५. रामनाममें तल्लीन होता है । १६. पवित्र होता है। १७. लोभरहित होता है । १८. कपटरहित होता है । १. १४१४-१४७८; गुजरातके सन्त कवि । इनका यह भजन आश्रममें प्रार्थनाके समय गाथा जाता था । Gandhi Heritage Portal
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