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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/१०४

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७६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय १९. कामरहित होता है । २०. क्रोधरहित होता है। इसमें वैष्णव शिरोमणि नरसिंह मेहताने अहिंसाको प्रथम स्थान दिया है अर्थात् जिसमें प्रेम नहीं वह वैष्णव नहीं है । अपनी प्रभाती में उन्होंने सिखाया है कि 'वेद' पढ़ने से, वर्णाश्रम धर्मका पालन करनेसे, कंठी पहननेसे अथवा तिलक लगानेसे कोई वैष्णव नहीं हो जाता। ये सब पापके मूल हो सकते हैं । पाखण्डी भी माला पहन सकता है, तिलक लगा सकता है, 'वेद' पढ़ सकता है, मुखसे राम नामका जाप कर सकता है। लेकिन पाखण्डी रहते हुए सत्याचरणी नहीं बना जा सकता; पाखण्डी परपीड़ाका निवारण नहीं कर सकता और पाखण्डके रहते हुए चंचल चित्तको निश्चल नहीं रखा जा सकता । मैं इन सिद्धान्तोंकी ओर सबका ध्यान आकर्षित करता हूँ; क्योंकि मेरे पास अन्त्यजोंके सम्बन्धमें पत्र आते रहते हैं । सब सलाह देते हैं कि यदि मैं राष्ट्रीयशाला से अन्त्यजोंका बहिष्कार नहीं करता तो स्वराज्यका आन्दोलन खत्म हो जायेगा । यदि मुझमें तनिक भी वैष्णवपन है तो ईश्वर मुझे अन्त्यजोंका बहिष्कार करके मिलनेवाले स्वराज्यका त्याग करनेका बल भी प्रदान करेगा। जिसमें दूसरे वर्ग और वर्ण आते हैं उस शालामें अन्त्यजोंका बहिष्कार न किया जाये - यह प्रस्ताव मेरा न होकर समस्त नियामक सभाका' है। मुझे यह प्रस्ताव प्रिय है। यदि सभा ऐसा प्रस्ताव पास न करती तो वह अधर्म करती । - ऐसा प्रस्ताव कोई नई बात नहीं है। वर्तमान स्कूलोंमें भी यह प्रस्ताव है । जिस कांग्रेसको वैष्णव भी मान देते हैं उसने भी इसी आशयका प्रस्ताव पास किया है। वैष्णवोंने उसका विरोध नहीं किया । तथापि ऐसे प्रस्तावमें मेरा हाथ है और वे मेरी ही ओर कटाक्ष करते हैं, यह तो मेरी समझमें मुझे मान प्रदान करता है । भले ही सब अधर्म करें लेकिन मेरे हाथसे अधर्म नहीं होना चाहिए, ऐसा उनकी दलीलका भाव है। मेरे लिए यह हर्षकी बात है । अन्त्यजोंको अस्पृश्य न मानना धर्म है, में यह बतानेका प्रयत्न कर रहा हूँ । लम्बे समय से पड़े हुए एक आवरणके कारण हम यह नहीं समझ पाते कि अन्त्यजोंको अस्पृश्य मानना अधर्म करना है । जैसे लम्बे समय से पड़े हुए आवरणके कारण अंग्रेजी राज्य अपने राक्षसपनको नहीं देख सकता और उसी प्रकार इसी कारणसे, हममें से कितने ही अपनी गुलामीकी जंजीरको नहीं देख पाते, ऐसे लोगोंको धीरजसे समझाना मैं अपना धर्म मानता हूँ । लेकिन दम्भ और मिथ्यावादको में सहन नहीं कर सकता । महाराजश्रीके साथ मेरा जो संलाप हुआ उसका विवरण मैंने 'गुजराती 'में देखा और उसपर की गई टीकाको भी पढ़ा। उन दोनोंसे मैं दुःखी हुआ हूँ । समाचारपत्रोंमें उल्लिखित विचारों- १. गुजरात विद्यापीठकी नियामक सभा ( सीनेट ); देखिए पृष्ठ ८, पाद-टिप्पणी १ । २. १७ नवम्बर, १९२० को गांधीजी वैष्णवोंके धर्म-गुरु गोस्वामी श्री गोकुलनाथजी महाराजसे बम्बई में मिले थे । इस भेंटका विवरण गुजरातीके २१-११-१९२० के अंकमें प्रकाशित हुआ था । Gandhi Heritage Portal