टिप्पणियाँ २१९ वक्ताको परेशान करनेका अधिकार नहीं है। एक सहिष्णु सरकारके बदले हम किसी असहिष्णु लोकतन्त्रकी स्थापना तो नहीं ही करना चाहते । असहयोग पशु-बलके मुकाबले जनमतके बलकी श्रेष्ठता सिद्ध करनेका प्रयास है । - सार्वजनिक अपव्यय इन्हीं पत्र लेखकोंने यह भी लिखा है : हमें बड़े दुःखके साथ आपका ध्यान बहुत-से लोगोंके इस सन्देहकी ओर भी आकृष्ट करना पड़ रहा है कि बड़े-बड़े भोज देकर, पहले दर्जेमें यात्रा करके, बिना किसी जरूरतके टैक्सी वगैरह किरायपर लेकर तथा अन्य अनेक तरीकोंसे भी नेतागण सार्वजनिक कोषका, जिसमें भिखमंगोंतक का योगदान है, अपव्यय कर रहे हैं। किसीका नाम नहीं दिया गया है। लेकिन मुझे लगता है, आक्षेप अली बन्धुओं- पर है। मुझे स्वयं भी अपना अपराध स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि इधर अपनी बीमारीके बाद से मैं भी दूसरे दर्जे में ही यात्रा कर रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि मौलाना शौकत अलीके लिए तीसरे दर्जेमें यात्रा करना लगभग असम्भव है। जो कार्यकर्त्ता ऐसे किसी कारणसे दूसरे दर्जे में चलनेपर मजबूर नहीं हैं, उन्हें भी वे दूसरे दर्जे में ले जाते हैं - इसे कार्यकर्त्ताओंके प्रति उनकी अनावश्यक दयालुता अवश्य मानी जायेगी। इसका कारण उनका उदार स्वभाव है। मुझे भरोसा है कि वे सार्वजनिक पैसेके मामलेमें कमसे- कम उतनी सावधानी तो अवश्य ही बरतते हैं जितनी कि अपने पैसेके बारेमें बरतते हैं। शानदार भोजोंमें उनके द्वारा कभी पैसा बरबाद करनेकी बात मुझे नहीं मालूम । और टैक्सी वगैरहपर तो वे बेकार पैसा खर्च नहीं ही करते। वे अपने-आपको और अपने साथियोंको जितनी सुख-सुविधा देते हैं, उसका खर्च आमतौर पर वे अपने मित्रोंकी जेब से चुकता करा देते हैं। फिर भी, मुझे पत्रकी यह बात अच्छी लगी । वैसे मैंने उन्हें बहुत निकटसे देखा है और लगभग एक सालसे उन्हींके साथ यात्रा करता रहा हूँ । इसलिए मैं कह सकता हूँ कि जिन हजारों लोगोंका उनपर विश्वास है, उन्हें अब भी उनकी ईमानदारीपर शक करनेका कोई कारण नहीं है। उन्हें समझना चाहिए कि श्री शौकत अली और उनके भाई जनताके ईमानदार, योग्य और अत्यन्त साहसी सेवक हैं । गाँवोंमें प्रचारकार्य इन पत्रलेखकोंने और भी बहुतसे विषयोंपर लिखा है । वे पूछते हैं कि गाँवोंमें प्रचार-कार्य कैसे चलाया जाये। उत्तर बहुत सीधा-सादा है। हर ग्रामवासीको -- चाहे वह मर्द हो या औरत - कांग्रेस में शामिल होना चाहिए और औरतोंको हर गाँवमें एक स्कूल खोलना चाहिए तथा हर घरमें चरखेको दाखिल करना चाहिए। ऐसा शायद ही कोई गांव हो जहाँ कोई मन्दिर या मसजिद न हो। इन मन्दिरों या मसजिदोंके अहातों में राष्ट्रीय स्कूल खोले जाने चाहिए और लड़कों और लड़कियोंको सीधी-सादी शिक्षा देनी चाहिए। अगर मेरी चले तो मैं हर स्कूलमें कताई अनिवार्य कर दूं । Gandhi Heritage Heritage Porta
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/२४७
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