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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/२६८

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२४० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय बुरा भी न रहता । साथ ही लॉर्ड रीडिंगकी नियुक्ति, शायद, इस हकीकतकी भी मूक स्वीकृति है कि हमारी लड़ाई अहिंसात्मक है और इसलिए इस समय कानूनकी बारीकियोंको समझनेवाला राजनीति-कुशल व्यक्ति ही सम्राट्का सबसे अच्छा और उपयुक्त प्रतिनिधि हो सकता है। लॉर्ड रीडिंगने सही काम करनेका इरादा जाहिर किया है। उनके इरादे में मुझे कोई शक नहीं है; लेकिन हुकूमतके जिस तन्त्रको चलाने- के लिए वे आ रहे हैं वह उन्हें सही काम नहीं करने देगा । भारतका तो यही तजुर्बा रहा है। अगर वे सही काम करने में कामयाब हो गये तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उन्हें इस तन्त्रको नष्ट करने या उसका आमूल सुधार करने में भी जरूर काम- याबी मिलेगी। या तो वे इस शासन-प्रणालीको अपने ढर्रेपर ले आयेंगे, या खुद उसीके ढर्रेमें ढल जायेंगे । 'इंडिया' और ब्रिटिश कमेटी 'क्रॉनिकल' अखबारने ब्रिटिश और 'इंडिया' अखबारको बन्द करनेके फैसलेको ' खेदजनक कहा है। इस रायके समर्थन में यह दलील दी गई है कि संविधान समितिने उन्हें खत्म करने की सलाह नहीं दी थी, और यह भी कि दोनों अच्छा काम कर रहे थे । यह सच है कि संविधान समितिने उन्हें खत्म करनेकी सिफारिश नहीं की थी । मगर यह भी याद रखना चाहिए कि वह समिति अमृतसर कांग्रेस के समय बनी थी और उसकी रिपोर्ट, कांग्रेसके जिस विशेष अधिवेशन में असहयोगका प्रस्ताव मंजूर किया गया, उसके पहले ही तैयार हो गई थी। उसके बादसे तो बहुत-सी ऐसी बातें हो गई हैं, जिन्होंने विदेशों में प्रचार और ब्रिटिश समितिके बारेमें हमारे और सारे देशके विचारों में क्रांतिकारी तबदीलियाँ कर दी हैं। उन्हें सैद्धान्तिक कारणोंसे ही बन्द किया गया। यह महसूस किया गया कि सरकारसे असहयोग करनेवाली कांग्रेस अपनी मदद के लिए विदेश में कोई संस्था रख नहीं सकती। कांग्रेसने असहयोगके भरोसे अन्य सभी सहारोंको जान-बूझकर ही तिलांजलि दे दी है। उसने आत्म-निर्भर होनेका फैसला किया है। जिस रूपमें उस कमेटीका गठन किया गया था, उस रूप में वह कार्यक्षम थी या नहीं, यह सवाल अब कोई मतलब नहीं रखता । इस बदली हुई हालत में कांग्रेसके लिए यह शोभाकी बात नहीं है कि वह प्रचार कार्यके लिए विदेशमें संस्था बनाये रखकर उसका खर्च उठाती रहे । राष्ट्रने इसके विषय में जो कारगर निर्णय कर दिया है उसे भ्रामक बातोंसे मिटाया नहीं जा सकता ।

आप चाहे इस हकीकतका ढिढोरा पीटें या न पीटें, मगर सचाई तो यही है कि शरीरको जरूरी खाना न मिले तो वह नष्ट हो जाता है । हम इस हकीकतका ढोल पीटें या चुप रहें मगर सचाई तो यही है कि अगर हम सरकारको सहयोग देना बन्द कर दें तो वह उसी समय अपनी मौत मर जायेगी । व्यक्तिशः मुझे तो वह प्रस्ताव १. देखिए " भाषण : विदेशोंमें प्रचारपर", २९-१२-१९२० । २. सितम्बर १९२० में कलकत्तामें हुआ कांग्रेसका विशेष अधिवेशन | Gandhi Heritage Portal