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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/३३९

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कुछ प्रश्न ३११ इस प्रयत्न के बाद भी समझ लीजिए कि मुसलमान भाई दगा देते हैं। एक बात तो यह है कि दोनोंका स्वार्थ हमेशा के लिए एकता बनाये रखने में ही निहित होगा । लेकिन अगर हम यह मानें कि खिलाफत रूपी विशेष अर्थके सध जानके बाद मुस- लमान हिन्दुओंका विरोध करनेके लिए जुट जायेंगे और इस भयसे हम आज यदि तटस्थ रहें तो उससे हम ब्रिटिश राज्यकी गुलामी करते रहने के सिवा और क्या साध सकेंगे ? मान लीजिए, आजके प्रयत्नोंसे खिलाफतकी रक्षा हो गई है, स्वराज्य मिला और बाद में मुसलमानोंने विश्वासघात किया; तो इससे भी क्या होता है ? बाईस करोड़ हिन्दुओंको क्या मुसलमान पराजित कर सकेंगे ? उनका आत्मबल, उनकी तपश्चर्या, उनका आजका किया यज्ञ क्या उनकी कोई मदद नहीं करेगा ? लेकिन अगर मुसल- मान बाहरसे अन्य लोगोंको लाकर हमसे लड़ें तो ? ऐसा भी हो तो क्या इससे सच्चा मर्द डर सकता है ? आजका प्रयत्न देशको स्वावलम्बी -- स्वतन्त्र बनानेका है। एक ही व्यक्ति हो तो भी छाती तानकर अनेकोंके सामने खड़ा रहे और जहाँ कदम रखा हो वहाँसे डग भर भी पीछे न हटे। पशु भी समय आनेपर ऐसा करते हैं। अरबके बच्चे ऐसा करते हैं, डच बालकोंको भी ऐसा करते हुए मैंने जाना है। यह कोई दैवी शक्ति नहीं है, यह तो सामान्य मनुष्यको भी प्राप्त होती है । जबतक बहुत सारे भारतीय इस शक्तिको प्रकट नहीं करते तबतक हिन्दुस्तान स्वतन्त्र नहीं हो सकता । राणा प्रतापके समय के क्षत्रियोंमें ऐसा धैर्य था । क्षत्रिय अर्थात् हनन करनेवाला नहीं; क्षत्रिय अर्थात् मरना जाननेवाला । 'गीता' की व्याख्याके अनुसार क्षत्रिय वह है जो भागता नहीं है, पीठ नहीं दिखाता । हिन्दू-मुसलमानोंकी आजकी एकतामें सौदेकी बात ही नहीं है। हमने जो समझौता किया है वह सौदेबाजीपर नहीं बल्कि परस्पर दोनोंकी उदारता पर आधारित है । यह लेन-देनकी दोस्ती नहीं है, यह तो दोनोंके लिए एक पक्षीय अनुबन्ध है; ऐसा ही अनुबन्ध स्वेच्छासे किया गया अनुबन्ध कहला सकता है। वह किसी एक पक्षके तोड़नेसे नहीं टूटता; और टूट भी जाता है। तोड़ने- वाला कानूनसे बँधा हुआ नहीं है लेकिन प्रेम तो उसे अपनेसे बांधे हुए ही है। कच्चे धागेसे मुझे हरिजीने बाँध लिया है वे जिधर खींचते हैं, मैं उधर ही मुड़ जाती हूँ मुझे तो प्रेमकी कटारी लग गई है। ' मीराने जो कहा सो करके दिखा दिया। प्रेमका यही धागा प्रत्येक मुसलमानको बाँधने और गायकी रक्षाके लिए काफी है। लेकिन भोजा भगतने' हमें प्रेमकी शर्तें भी गिनाई हैं : भक्ति की राह में शीशका सौदा करना पड़ता है; बहुत जटिल है उसकी राह । १. ' काचे रे तांतणे मने हरिजीए बाँधी जेम ताणे तेम तेमनी रे ! भने लागी कटारी- प्रेमनी ।' २. मध्य युगके गुजराती कवि । Gandhi Heritage Portal