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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/५९४

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५६६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय और बहुधा असमंजसपूर्ण स्थितिमें पाता हूँ । लोग कहते हैं कि मुझमें अलौकिक शक्तियाँ हैं, जब कि जो भी थोड़ी-बहुत शक्ति मुझमें है, वह मुझे सत्यके प्रति अपनी दृढ़ निष्ठासे, मेरे अदमनीय उद्यमसे, विपक्षी के प्रति मेरे न्याय संगत व्यवहारसे, सदैव अपनी भूल स्वीकार करनेकी तत्परतासे, तथा निरन्तर विवेकसे काम लेते रहनेके गुणसे प्राप्त हुई है । किन्तु भोली जनता मेरी बातपर विश्वास ही नहीं करती कि मुझमें कोई असाधा- रण शक्ति नहीं है । इसी प्रकार ऐसे लोग जिन्हें राजनीतिमें पूर्णतः प्रामाणिक व्यवहार देखनेका अभ्यास नहीं है, वे बराबर मुझमें सब प्रकारकी दुष्टताओंका आरोप करते जाते है । 'मॉर्निंग पोस्ट'का विश्वास है कि फीजीकी हड़ताल एक साधुके प्रयत्नोंसे हुई, जिसे मैंने वहाँ भेजा था । यहाँ मैं जानता भी नहीं कि यह तथाकथित साधु कौन है । निश्चय ही मैंने हड़तालकी सलाह देनेके लिए किसीको फीजी नहीं भेजा । तथापि, फीजी में यदि हड़ताल घोषित हो गई है, तो हड़तालियोंके साथ मेरी सहानुभूति है । मुझे जो कुछ भी सामग्री उपलब्ध है, उससे सिद्ध होता है कि फीजी एक विशाल शोषण केन्द्र है, जहाँ गन्ने की खेती करनेवाले अपने विपुल लाभके लिए बेचारे भारतीय मजदूरोंका शोषण करते रहते हैं । 'टाइम्स ऑफ इंडिया' ऊपर निर्देशित भ्रान्त धारणाओं जैसी ही भ्रान्त धारणा 'टाइम्स आफ इंडिया ' की भी है, जिसके हालके दो लेखोंकी ओर एक मित्रने मेरा ध्यान आकर्षित किया है। नियमपूर्वक अखबार न पढ़ सकनेके कारण, मुझे मालूम नहीं कि और दूसरे अखबार मेरा और कितना अधिक गलत सलत चित्रण करते रहते हैं । 'टाइम्स आफ इंडिया, जिसे मेरी बात ज्यादा अच्छी तरह समझ सकनी चाहिए, कदाचित् अनजानेमें मुझे गलत समझता है। उसके एक लेखमें कहा गया है कि मैंने असहयोग आन्दोलनको स्थगित कर दिया है; अर्थात् मैंने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीको सलाह दी है, कि वह अपना ध्यान कार्यकर्त्ता बनाने, धन संग्रह करने और चरखेके प्रचारपर केन्द्रित करे। मुझे खेद है कि मैं इसका यह अर्थ स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि मैंने आन्दो- लन स्थगित करने की सलाह नहीं दी है, और उसका कारण मैं श्री रजा अलीको दिये गये अपने उत्तरमें दिखा चुका हूँ। दूसरे लेखमें कहा गया है कि अब मैं " पहले- वाला गांधी नहीं रहा, ” और इसलिए पाठकोंको मुझसे आन्दोलनके पहले दौरमें असहयोगियोंकी जो हार हुई है, उसे स्वीकार करनेकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हारकी तो बात ही क्या, मैं तो लोगोंमें जो जागृति हुई है, उससे चकित हूँ। मेरी रायमें ऐसी संस्थाओंके विरुद्ध, जिनके आधारपर शासन अपनी साख जमाता है, शक्ति- शाली जनमत तैयार कर देना ही बड़ी बात है । 'टाइम्स ऑफ इंडिया' समझता है कि असहयोग खाई में गिरनेका सीधा रास्ता है । किन्तु मैं विनम्रतापूर्वक यह कहूँगा कि वह स्वर्गतक पहुँचनेका एक दुर्गम मार्ग है। यदि आन्दोलनका उद्देश्य अराजकता उत्पन्न करना होता, तो वह किसी भी क्षण उत्पन्न की जा सकती थी । टाइम्स ऑफ इंडिया ' और अन्य आलोचक, जो मैं समझता हूँ, संघर्षके मर्मको समझना चाहते हैं, इस तथ्यको ठीक-ठीक हृदयंगम करें तो अच्छा हो कि केवल मैं ही नहीं बल्कि सभी नेता अराज- Gandhi Heritage Portal