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उड़ीसा और आन्ध्र ५७१ लाखों चटाइयाँ बिकेंगी नहीं। खाद्य सामग्रीके बाद सूत ही वह चीज है जिसकी बाजारमें सदा माँग रहती है । मैं कांग्रेसके नेताओंसे मिला। मैंने उन्हें यह कहानी सुनाई, उनमें से कुछ उन दृश्योंके साक्षी थे, जिनका मैंने वर्णन किया है। वे इस बातसे सह- मत हुए कि कांग्रेसका पैसा मुख्यतः चरखेके प्रचारके ही काम आना चाहिए और पैसा महन्तों तथा तीर्थयात्रियोंसे आसानीसे प्राप्त किया जा सकता है । इस प्रकार कंगालीसे ग्रस्त उड़ीसा में भी कांग्रेस कमेटी आत्म-निर्भर हो सकती है, और भूखोंके पेट भरकर स्वराज्य और भी पास ला सकती है। कार्यकर्त्ता भी उनके पास हैं । पंडित गोपबन्धु दास, जो विधान परिषद्के भूतपूर्व सदस्य हैं, भूतपूर्व वकील हैं, और भी जाने क्या-क्या हैं, एक निःस्वार्थ नेता हैं । कहा जाता है कि वे और उनके दलके लोग चावल और दालपर गुजर करते हैं। उन्हें आजकल घी भूले-भटके ही कभी मिलता है । असहयोगके बाद अब कार्यकर्त्ता कमसे- कम जीवन वेतन लेने लगे हैं, यहाँतक कि दस रुपया प्रतिमास । तब यदि मैं विश्वास करता हूँ कि ऐसे ईमानदार कार्यकर्त्ताओंकी सहायतासे स्वराज्यकी प्राप्ति इसी वर्षके भीतर सम्भव है, तो इसमें आश्चर्य क्या है ? पुरीसे बारह मील इसी ओर साखीगोपालमें खुली हवामें पंडित गोपबन्धु दासका एक स्कूल है। वह निकुंज-शाला है; देखने योग्य है। मैंने वहाँ लड़कों और शिक्षकोंके बीच एक दिन बड़े आनन्दके साथ बिताया । खुले मैदानमें अध्यापनका यह एक सोच- समझकर किया जानेवाला प्रयोग है । यहाँके कुछ लड़के व्यायामशील और तगड़े दिखे । उड़ीसा की शिकायत उचित है । जैसा कि 'उड़िया मूवमेन्ट' (उड़िया आन्दोलन ) नामक पुस्तकके योग्य लेखक कहते हैं, उड़ीसा के टुकड़े राजनैतिक उद्देश्यसे किये गये हैं। कुछ हिस्सा बंगालका हो गया है, कुछ बिहारका, कुछ मध्य प्रान्तका और कुछ आन्ध्रका । उड़ीसाका अपना कुछ नहीं रहा। कांग्रेसने उड़ियाभाषी लोगोंका एक प्रान्त माना है। बिहार, बंगाल और मध्य प्रान्तसे कोई झगड़ा नहीं है। किन्तु बहरामपुर- पर उड़िया लोगोंके दावेका आन्ध्रवासी प्रतिवाद करते हैं। मैंने उनके मार्गदर्शनके लिए कुछ साधारण नियम सुझानेका साहस किया है। एक सर्वोत्तम नियम, जो सब जगह समान रूपसे लागू हो सकता है और जो हमें वर्तमान संघर्षसे सीखना चाहिए, यह है कि सशक्तोंको अशक्तोंकी बात मान लेनी चाहिए। सन्देहकी स्थितिमें अशक्तोंके पक्षमें न्याय दिया जाना चाहिए। उड़ीसा के संस्मरण मैं उन हजारों निर्धन लोगोंके स्मरणके साथ समाप्त करूँगा जो साखीगोपालकी आम सभामें आये थे, और जिन्होंने अपनी गिरह खोल-खोलकर पाइयाँ और पैसे दिये थे । वे पैसे मानो विधवाकी अत्यन्त सफल आशीर्वादोंसे सम्पन्न कौड़ी थी । उन हजारों लोगोंको एक दूसरेसे चन्दा देनेका आग्रह करते देख मैं और भी आशावादी हो गया हूँ । आन्ध्र देश उत्कलसे भिन्न है । वह जीवनी शक्ति से ओतप्रोत है । वहाँ मुझे मांसहीन हड्डियोंके ढाँचे नहीं दिखाई दिये । वहाँके लोग हृष्ट-पुष्ट, बलवान, आग्रही, उदार और स्नेही हैं। अपने प्रान्तके और भारतके भविष्यमें उनका विश्वास है । पुरुषों और स्त्रियों, दोनोंके पास सोनेके प्रचुर आभूषण हैं। लेकिन आभूषण मुझे दिखाना तो भयंकर भूल होती है । मैंने यह बात छुपाई नहीं कि मुझे वे आभूषण Gandhi Heritage Porta