५७२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय तिलक महाराजके लिए तथा स्वराज्यके लिए चाहिए। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक दे दिये, पुरुषोंने और स्त्रियोंने भी। उन्होंने ६ दिनमें लगभग पचास हजार रुपये दिये, तथा और अधिकके लिए वचन दिया। अगर चाहते, तो आन्ध्रके लोग अपने आभूषणोंसे ही एक करोड़ रुपया एकत्र कर सकते थे । मैंने आन्ध्रवासियोंसे कहा कि उनकी महिलाओंका खुला व्यवहार, चालढालका आभिजात्य, बाहर निकलनेकी स्वतंत्रता और साथ ही उनका शील-संकोच देखकर मुझे महाराष्ट्रकी स्त्रियोंका स्मरण हो आता है। यह बहुत बड़ी प्रशंसा है। उनके सम्बन्धमें अपनी इस रायपर मैं अब भी कायम हूँ । कलकत्तामें शिक्षित और नवविवाहित एलौरकी एक लड़की, अन्नपूर्णादेवीने अपने सुहाग-चिह्नोंको छोड़कर प्रायः सभी जेवर दे दिये । वे सरसे पैरतक खद्दरकी पोशाकमें थीं । आन्ध्रके पुरुषों और स्त्रियोंकी उदारता संक्रामक थी । पंजाबी बहनोंको सुन्दर कताईके मामलेमें अब आन्ध्रकी बहनोंका लोहा मानना पड़ेगा । मैं समझता था कि पंजाबी बहनोंसे अधिक सुन्दर कताई कोई नहीं कर सकता । किन्तु आन्ध्रकी बहनें १०० नम्बरका सूत कातती हैं । वे अपनी रुई स्वयं साफ करतीं और धुन लेती हैं। मैं सुन्दर बुने हुए सूतके कुछ नमूने अपने साथ लाया हूँ, जो जापान, फ्रांस अथवा लंकाशायरके किसी भी वस्त्रको मातकर सकते हैं । यह कला नष्ट होने जा रही थी; स्वदेशी आन्दोलनने इसे बचा लिया। मसूलीपट्टममें कुछ महिलाओंने मेरे सामने अपनी कलाका प्रदर्शन करनेकी कृपा की। बहनोंसे छाई हुई एक झोंपड़ीमें कला-प्रदर्शनका वह दृश्य हृदयको छू लेनेवाला था । उन्होंने कपासको साफ किया, धुना, काता। मुझे तो वहाँ चरखेमें विश्व संगीत सुनाई दिया । किन्तु अब मुझे आत्माको विभोर कर देनेवाली बातोंसे आत्माका हनन करनेवाली बातोंकी ओर उतरना पड़ता है। कोकोनाडामें, विशाल आमसभा के बाद रातके ९ बजे ज्यों ही मैं बंगलेपर लौटा, कुछ स्त्रियाँ और लड़कियां मुझसे मिलने आई। मैंने प्रवेश किया तब प्रकाश बहुत मन्द था । उनकी चालढाल और उनकी सूरतमें कुछ विचित्रता थी । जाने क्यों, वार्तालापका आरम्भ मैं जिन शब्दोंसे करता हूँ, यानी “क्या आप सूत कातती हैं ? तिलक स्वराज्य कोषके लिए आप मुझे क्या देंगी " ? वे शब्द मेरे ओठों तक नहीं आये । उलटे, मैंने अपने मेजबानसे पूछा, ये महिलाएँ कौन हैं? उन्हें मालूम नहीं था । उन्होंने उनसे पूछा, और कुछ हिचकिचाहटके बाद उत्तर मिला, “हम नर्तकियाँ हैं।" मुझे लगा कि मैं धरतीमें समा जाऊँ। मेरे मेजबानने यह कहकर मेरा मन शान्त करना चाहा कि इनके जीवनका प्रारम्भ एक धार्मिक विधिसे होता है। मेरे लेखे इससे बात और भी बिगड़ गई। इससे तो यह घृणित कार्य एक प्रकारसे सम्माननीय हो गया । मैंन तरह-तरह के प्रश्न किये। उन्होंने अत्यन्त विनम्र शब्दों में कहा कि वे दर्शन करने आई हैं। ... " क्या आप कोई और काम करेंगी ? 'अवश्य, यदि उससे हमारी जीविका चल जाये।" मेरा मन नहीं माना कि बात वहीं खत्म कर दी जाये। मैंने उस समय अपने पुरुष होनेमें लज्जाका अनुभव किया। मैंने दूसरे दिन सबेरे अपने आगामी मुकाम, राजमहेन्द्री में सीधी स्पष्ट बात कही । आन्ध्रमें मेरा यह एक अत्यन्त दुःखदायी अनुभव था । मेरा खयाल है यह पाप किसी न किसी रूपमें देशके और भागों में भी 11 Gandhi Heritage Porta
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