उड़ीसा और आन्ध्र ५७३ समान रूपसे व्याप्त है । मैं इतना ही कह सकता हूँ कि यदि हम आत्म-शुद्धि द्वारा स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें नारीको अपनी वासनाका शिकार नहीं बनाना चाहिए। अशक्तोंकी रक्षाका नियम यहाँ विशेष जोरके साथ लागू होता है । मेरे लिए तो गोरक्षाके अर्थ में हमारी नारीजातिकी रक्षा भी शामिल है । जबतक हम अपनी माताओं, बहनों तथा बेटियोंके समान देशकी सभी महिलाओंका सम्मान नहीं करने लगते, तबतक हम भारतका नवनिर्माण नहीं कर सकेंगे। हमें अपने उन पापोंको धो डालना चाहिए, जो हमारे भीतरके मनुष्यकी हत्या करते और हमें जानवर बना देते हैं। अब फिर अधिक सुखदायी बातोंकी ओर लौटा जाये । मसूलीपट्टमके प्रवासमें मेरी आँखोंमें आनन्दके आँसू आ गये। वह मेरा मौन दिवस था । मैंने डाक्टर पट्टाभि सीता- रामैया से कहा था कि जब मैं मसूलीपट्टममें प्रवेश करूँ, तो वे ऐसी व्यवस्था करें कि मैं कोलाहल तथा प्रदर्शनसे बचा रहूँ । अतः लोगोंको पहले ही से चेतावनी दे दी गई थी। जब हमारी मोटर वहाँ पहुँची, तब सबेरा हुआ ही था । लोग सुसज्जित सड़कोंके किनारे खड़े थे, किन्तु आवाज बिलकुल नहीं हो रही थी। सब चुपचाप अपने-अपने स्थानपर खड़े थे । और जब मैंने राष्ट्रीय महाविद्यालयके द्वारमें प्रवेश किया, तो कोई आवाज नहीं हुई । केवल बाँसुरीकी संगतके साथ वायलिनपर छेड़ी गई एक मधुर प्रार्थना-धुनसे मेरा अभिवादन किया गया। मैंने उनके मधुर स्नेहका मूल्य समझा। साथ ही मेरी समझमें आया कि लोगोंमें अनुशासनकी बड़ी सामर्थ्य है, यह भी कि उनकी देश-भक्ति- की भावनासे जो विभिन्न अपेक्षाएँ की जाती हैं, उनको वे कैसी तत्परतासे पूरी करते हैं । मैंने आनन्दाश्रुओंके साथ प्रभुको उसकी अपार करुणाके लिए धन्यवाद दिया । मुझे लोग एक सचमुचकी 'पर्णकुटी' में ले गये। वहाँ जब मैं शिक्षकों तथा प्रबन्धकोंको अपने-अपने नियत कार्योंकी व्यवस्थित कार्यप्रणाली, कला तथा व्यवसायके लिए बधाई दे रहा था, मुझसे यह कहे बिना नहीं रहा गया कि उनका कार्य तबतक पूर्णतः राष्ट्रीय नहीं कहा जा सकता, जबतक प्रत्येक विद्यार्थी और शिक्षक अपना प्रायः सभी समय और ध्यान कताई और बुनाईमें न लगाये, और इस प्रकार अपनी संस्थाको विशेष रूपसे कताई और बुनाईकी संस्था न बना दे । जब मैं अपने इस विषयके सम्बन्धमें बोल रहा था, उसी समय श्री कृष्णराव, जो बराबर मेरी बात सुन रहे थे, किन्तु विचार- विमर्शमें क्वचित् ही भाग ले रहे थे, नेत्रोंमें मानो आध्यात्मिक ज्योति भरकर बोले, " तो आप कताईको एक धार्मिक अनुष्ठान मानते हैं ? "; अवश्य मैंने कहा, " आपके इस शब्दप्रयोगके लिए धन्यवाद, आगे मैं इसका प्रयोग करूँगा । " कताई राष्ट्रकी शुद्धि, शक्ति तथा समृद्धिका प्रत्यक्ष एवं पवित्र प्रतीक है। यह एक कर्तव्य है और कोई हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई, यहूदी या पारसी, सबके लिए करणीय हैं। आन्ध्र राष्ट्रीय महाविद्यालय पुरानी संस्था है, जिसपर आन्ध्रवासियोंको गर्व होना उचित है । यह संस्था १९०७ के बंगालके जागरणकी देन है और कई तूफान झेल चुकी है। मैं आशा करता हूँ कि वर्तमान जागरणके दौरमें से यह और भी अधिक शुद्ध एवं शक्तिशाली संस्था 73 १. प्रमुख कांग्रेसी नेता; १९४८ में कांग्रेसके अध्यक्ष, 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसका इतिहास ' के लेखक | Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/६०१
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