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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/६०२

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५७४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय होकर निकलेगी। इसमें निश्चय ही वे सब गुण हैं, जिसके बलपर वह ऐसा केन्द्र बन सकती है जहाँसे वर्त्तमान भावनाके अनुकूल अत्यन्त शुद्ध कार्यकलापकी ज्योति चारों ओर फैले । आन्ध्र देश में एक तेजस्वी सुधारक और दलित वर्गोंके सहृदय समर्थक श्री राम- चन्द्रराव हैं । वे ब्राह्मण हैं, किन्तु उनकी शुद्ध आत्मा अस्पृश्यताके अभिशापको सहन नहीं कर सकती। वे अपने दलित भाइयोंकी ओरसे जी-तोड़ परिश्रम कर रहे हैं । अपने परिया अर्थात् अछूत भाइयोंकी दासताको मिटानेके लिए उनकी अधीरता ठीक ही है; और वे उन्हें अन्य हिन्दुओंसे असहयोग तक करनेकी सलाह देना चाहते हैं । यद्यपि मैं भी अपने दलित वर्गोंके पक्षमें उतना ही उत्साही होनेका दावा करता हूँ, तथापि मैंने उन्हें आगाह किया कि जबतक स्वयं उन लोगोंके बीच कोई शुद्ध और निःस्वार्थ व्यक्ति पैदा न हो, वे ऐसा असहयोग शुरू न करें, क्योंकि असहयोग आत्मशुद्धिका, आत्मसाहाय्यका, आत्म-निर्भरताका आन्दोलन है; वह हमें ठीक प्रकारके सहयोग के लिए बाध्य करता है । आन्ध्रवासियोंने मेरा मन हर लिया है। बिहार तो बहुत समयसे मुझे विशेष प्रिय रहा है । असहयोगकी शुरुआतसे बहुत पहले ही बिहारपर मेरा विश्वास जम गया था। आन्ध्र प्रदेश यदि इसमें बिहारसे आगे नहीं बढ़ गया है तो उसने दूसरा स्थान तो मजे में प्राप्त कर लिया है। आन्ध्र देशको अत्यन्त निःस्वार्थ नेता मिले हैं । उसके कार्यकर्त्ता परिश्रमशील और दृढ़ हैं। उसके पास साधन हैं, उसमें काव्य है, श्रद्धा है, और त्यागकी भावना है । वहाँ कई राष्ट्रीय स्कूल हैं; उसने हमारे ध्येयके निमित्त कई वकील हमें दिये हैं; हाथकी कताई और हाथकी बुनाईकी तो वहाँ बहुत ही बड़ी- बड़ी संभावनाएँ हैं; वहाँ उत्तम कपास होता है । वहाँ दो विशाल नदियाँ हैं, जो पार्श्व- प्रदेशको सींचती हैं। उसमें ऐसे भू-क्षेत्र हैं, जो कभी इतिहासमें प्रसिद्ध थे । वह निश्चय ही अग्रणी है, या कमसे कम बिहारसे होड़ लेता है । मेरा यह विश्वास कायम है कि यदि आतंकवाद (जो दमनसे अलग चीज है ) का प्रारम्भ हुआ, और उसमें तथाकथित बड़े प्रान्त हार भी गये, तो बिहार और आन्ध्र आत्माके शौर्य, अर्थात् कष्ट-सहिष्णुतामें सिखोंको भी मात कर देंगे और लज्जा रख लेंगे । मेरा अनुमान गलत भी हो सकता है । हममेंसे प्रत्येकको शेष सभीसे आगे निकलनेकी कोशिश करनी चाहिए। यह एक ऐसी दौड़ है, जिसमें स्पर्धा न केवल सद्गुण है, वरन् कर्त्तव्य भी है । दो सुन्दर गाँवों और उनके नेतापर सविनय अवज्ञाका प्रयोग जबरदस्ती लद गया है ! उसके बारेमें फिर कभी लिखूंगा । नेलौरकी हिन्दू-मुस्लिम समस्याकी चर्चा भी फिर कभी करूंगा। मुझे अब इन संस्मरणोंको कृतज्ञताके साथ इस तथ्यका उल्लेख करते हुए समाप्त करना चाहिए कि यद्यपि मेरे साथ हरिजन साथी भी थे, तथापि श्री हनुमन्तराव और उनके साथियों द्वारा संचालित कताई-बुनाईके एक आश्रमके' पड़ोस के एक गाँव के ब्राह्मणोंने मुझे आमन्त्रित किया कि मैं उनके गाँवमें से होता १. शायद नेलौरसे पाँच मोलकी दूरीपर स्थित पल्लिपाङका आश्रम, जिसका गांधीजीने ७ अप्रैलको उद्घाटन किया था । Gandhi Heritage Porta