भाषण : दलित वर्ग सम्मेलन, अहमदाबादमें ५७७ मैं अस्पृश्यताको हिन्दू धर्मका सबसे बड़ा कलंक मानता हूँ । मेरे मनमें इस विचारका प्रादुर्भाव दक्षिण आफ्रिकी संघर्षके दिनोंमें हुए कटु अनुभवोंसे हुआ था । इसका कारण यह नहीं कि मैं कभी नास्तिक था । और यह सोचना भी उतना ही अनुचित है जैसा कि कुछ लोग समझते हैं. - कि मुझे यह विचार ईसाई धार्मिक साहित्य के अध्ययनसे मिला है। मेरी यह धारणा उस समयकी है जब 'बाइबिल ' या 'बाइबिल' मतानुयायियोंसे न तो मेरा कोई प्रेम था और न परिचय ही । -- मेरे मनमें जब यह धारणा उत्पन्न हुई थी तब मैं मुश्किलसे १२ सालका था। ऊका नामका एक भंगी हमारे घरकी टट्टियाँ साफ किया करता था । मैं अपनी माँसे यह प्रायः पूछा करता कि उसे छूना क्यों बुरा है, उसे छूनेसे मुझे क्यों रोका जाता है । यदि संयोगसे उसे छू जाता तो मुझे नहानेके लिए कहा जाता था । मैं इसे मान तो लेता था, फिर भी मुस्कराते हुए आपत्ति जरूर करता और कहता कि अछूतपन धर्मसम्मत नहीं है, उसका धर्मसम्मत होना असम्भव है । मैं एक बहुत ही कर्त्तव्यपरायण और आज्ञाकारी बालक था। माता-पिताके प्रति आदरभावका खयाल रखते हुए इस मामलेमें जहाँतक उनसे झगड़ सकता था अकसर उनसे झगड़ पड़ता था । मैं अपनी माँसे कहा करता कि उनका यह खयाल कि ऊकासे छू जाना पाप है, बिलकुल गलत है । मैं जब स्कूलमें होता तो प्रायः संयोगसे 'अछूत' को छू लेता और चूंकि इस बातको मैं अपने माता-पितासे छिपाता नहीं था अतः मेरी माँ मुझसे कहतीं कि इस छू जानेपर अपवित्र हो जानेके पश्चात् पवित्र होनेका सबसे सीधा तरीका यह है कि यदि कोई मुसलमान पाससे जा रहा हो तो उसे छू लिया जाये । छूत अपने आप मिट जायेगी। मुझे केवल इसलिए कि अपनी माँके प्रति मेरे मनमें श्रद्धा थी और मैं उनसे प्रेम करता था, प्रायः ऐसा करना पड़ता था, लेकिन मैं यह काम इस विश्वासके साथ नहीं करता था कि स्नान करना धर्मकी दृष्टिसे अनिवार्य है। कुछ समय बाद हम लोग पोरबन्दर चले गये जहाँ संस्कृतसे मेरा प्रथम परिचय हुआ । तबतक मैं अंग्रेजी स्कूलमें दाखिल नहीं कराया गया था। मेरे भाईको और मुझे एक ब्राह्मणके संरक्षण में रख दिया गया था जो हमें 'रामरक्षा', और 'विष्णुपूजा' पढ़ाया करता था। उनके 'जले विष्णुः थले विष्णुः ' श्लोक मुझे कभी नहीं भूले । हमारे घरके पास ही एक ममतालु बूढ़ी अम्मा रहा करती थी। मैं संयोगवश उन दिनों एक बहुत ही डरपोक बालक था और जब दीपक बुझा दिये जाते और अंधेरा हो जाता, तब मेरे मनमें भूतों और प्रेतोंकी कल्पना आया करती थी । बूढ़ी अम्माने मेरा भय दूर करनेके लिए मुझसे कहा कि जब मुझे कोई भय लगे तब मुझे 'रामरक्षा स्तोत्र' का पाठ करना चाहिए। उससे सब भूत-प्रेत भाग जायेंगे। मैं ऐसा ही करता और मेरा खयाल है कि उसका नतीजा अच्छा ही निकलता । 'रामरक्षा' के किसी श्लोकमें अछूतोंका छूना पाप बताया गया हो ऐसा मुझे नहीं लगा । मैं तब उसका मतलब नहीं समझता था और यदि समझता भी था तो बहुत ही कम । लेकिन मुझे इस बातका पूरा विश्वास हो गया था कि जिस ( रामरक्षा 'से भूतोंका सम्पूर्ण भय नष्ट हो जाता है, उसमें अछूतोंसे स्पर्शके भयका समर्थन कैसे हो सकता है । १९-३७ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/६०५
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