५७८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय हमारे परिवारमें 'रामायण' का पाठ नित्य होता था । लाधा महाराज नामके एक ब्राह्मण उसे पढ़ा करते थे । उन्हें कोढ़ हो गया था, और उनकी ऐसी श्रद्धा थी कि 'रामायण' का नियमित पाठ करनेसे उनका कोढ़ दूर हो जायेगा और सचमुच उनका कोढ़ दूर हो गया। मैं अपने मनमें सोचता कि आज जिसे हम अछूत कहते हैं वह रामको गंगा पार ले गया यह प्रसंग जिस 'रामायण' में है उस 'रामायण' में किसी भी मनुष्यको भ्रष्टात्मा कहकर उसके अस्पृश्य माने जानेकी भावनाका समर्थन कैसे हो सकता है ? ईश्वरको हम पतितपावन या ऐसे ही अन्य नामोंसे पुकारते हैं, इस बातसे तो यही सिद्ध होता है कि भारतमें जन्मे किसी भी व्यक्तिको पतित या अछूत कहना पाप | मैं तभीसे यह कहते नहीं थकता कि अस्पृश्यता एक महापाप है । मैं यह ढोंग नहीं रचता कि यह बात बारह सालकी आयुमें मेरे दिलमें पूरे तौरसे बैठ चुकी थी । किन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि मैं तब भी अछूतपनको पाप समझता था । यह बात मैं वैष्णवों और सनातनी हिन्दुओंकी जानकारीके लिए कह रहा हूँ । है -- दानवता मैंने सदा ही सनातनी हिन्दू होनेका दावा किया है। मुझे हिन्दू धर्मशास्त्रोंका बिलकुल ही ज्ञान न हो, सो बात नहीं है। मैं संस्कृतका कोई बड़ा पण्डित नहीं हूँ । मैंने 'वेदों' और 'उपनिषदों' के केवल अनुवाद ही पढ़े हैं, इसलिए स्वभावतः इन ग्रंथोंका मेरा अध्ययन पाण्डित्यपूर्ण नहीं है । मुझे उनका जो ज्ञान है वह किसी प्रकारसे गम्भीर नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक हिन्दूको उनका जितना अध्ययन करना चाहिए वैसा मैंने कर लिया है और मेरा दावा है कि मैं उनके मर्मसे परिचित हो गया हूँ । २१ वर्षका होते-होते तो मैं दूसरे धर्मोके ग्रंथोंका अध्ययन भी कर चुका था । एक समय था जब मैं हिन्दू धर्म और ईसाई धर्मके बीच डगमगा रहा था। जब मेरा मानसिक सन्तुलन ठीक हुआ तब मैंने अनुभव किया कि मेरी मुक्ति तो हिन्दू धर्म में रहकर ही सम्भव है और तबसे हिन्दू धर्ममें मेरी श्रद्धा अधिक गहरी और ज्ञानमय होती गई है। लेकिन उन दिनों मेरा विश्वास था कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्मका अंग नहीं है और यदि वह उसका अंग है तो ऐसा हिन्दू धर्म मेरे कामका नहीं । यह सच है कि हिन्दू धर्ममें अस्पृश्यता पाप नहीं समझी जाती। मैं शास्त्रोंकी व्याख्याके सम्बन्धमें किसी वाद-विवादमें नहीं पड़ना चाहता । 'भागवत' या 'मनुस्मृति' से प्रमाण प्रस्तुत करके अपनी बातको सिद्ध करना शायद मेरे लिए कठिन भी हो । लेकिन मैं हिन्दू धर्मके तत्वको समझ चुकनेका दावा करता हूँ । अस्पृश्यताकी अनुमति देकर हिन्दू धर्मने पाप किया है। इससे हमारा पतन हुआ है और हम साम्राज्य में शूद्र-जैसे माने जाते हैं । हमसे यह छूत मुसलमानोंको भी लग गई है और दक्षिण आफ्रिका, पूर्वी आफ्रिका और कनाडामें हिन्दुओंकी तरह वे भी शुद्र माने जाने लगे हैं। यह सब दोष अस्पृश्यताके पापसे उत्पन्न हुए हैं। अब मैं आपका ध्यान अपने मन्तव्यकी ओर ले जाना चाहता हूँ। वह इस तरह है; जबतक हिन्दू लोग जानबूझकर अछूतपनको अपने धर्मका अंग मानते रहेंगे, जबतक हिन्दू जनसाधारण अपने समाजके एक भागको छूना पाप समझते रहेंगे तबतक स्वराज्य- की प्राप्ति असम्भव है । युधिष्ठिर अपने कुत्तेको साथ लिये बिना स्वर्ग में नहीं गये तब Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/६०६
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