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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/६०७

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भाषण : दलित वर्ग सम्मेलन, अहमदाबादमें ५७९ उन्हीं युधिष्ठिरके वंशज अछूतोंको छोड़कर स्वराज्य पानेकी आशा कैसे कर सकते हैं ? जिन अपराधोंके लिए हम इस सरकारकी निन्दा करते हैं और उसे दानवी सरकार कहते हैं, उन अपराधोंमें से ऐसा कौनसा अपराध है जो हमने अपने इन अछूत भाइयोंके प्रति नहीं किया है, और जिसके हम दोषी नहीं हैं ? हम अपने भाइयोंको दलित बनानेके दोषी हैं? हम उनको पेटके बल रंगाते हैं, हमने उनसे जमीनपर नाकेँ रगड़वाई हैं; हम क्रोधसे अपनी आँखें लाल करके उन्हें रेल के डिब्बों में से बाहर ढकेल देते हैं - अंग्रेजी शासनमें हमारे साथ इससे ज्यादा क्या किया गया है ? हम डायर और ओ'डायरपर जो आरोप लगाते हैं उनमें से कौनसे आरोप हैं जो दूसरे लोग और हमारे अपने लोग भी, हमपर नहीं लगा सकते ? हमें अपनी यह अपवित्रता अपनेमें से दूर कर देनी चाहिए। जबतक हम कमजोर और अस- हाय लोगोंकी रक्षा नहीं करते या जबतक एक भी स्वराज्यवादी किसी व्यक्तिकी भावनाओंको चोट पहुँचा सकता है तबतक स्वराज्यकी बात करना व्यर्थ है । स्व- राज्यका अर्थ तो यह है कि स्वराज्यमें कोई भी हिन्दू या मुसलमान एक क्षणके लिए भी गर्वपूर्वक यह नहीं सोच सकता कि वह निर्भय होकर किसी भी हिन्दू या मुसल- मानको कुचल सकता है। जबतक यह शर्त पूरी नहीं होती तबतक यदि हमें स्वराज्य मिल भी जायेगा तो वह तुरन्त ही हाथसे निकल जायेगा । हमने अपने इन कमजोर भाइयोंके प्रति जो पाप किये हैं उनसे जबतक हम शुद्ध नहीं हो जाते तबतक हम पशुओंके समान ही हैं । लेकिन मुझे अब भी अपनेमें विश्वास बना हुआ है । भारतमें की गई अपनी यात्राओंमें मैंने यह देखा है कि दयाभाव, जिसका तुलसीदासने अत्यन्त सारगर्भित वर्णन किया है, जो जैन और वैष्णव धर्मोका मुख्य अंग है, जो 'भागवत' का सार है और जो 'गीता' के प्रत्येक श्लोकमें विद्यमान है- -- वह दयाभाव, वह प्रेम वह औदार्य इस देश के सामान्य जनोंके हृदयोंमें धीरे-धीरे किन्तु दृढ़तापूर्वक बद्धमूल होता जा रहा है । हम आज भी हिन्दुओं और मुसलमानोंके बीच अनेक झगड़ोंकी बात सुनते रहते हैं । अब भी कुछ हिन्दू और मुसलमान ऐसे हैं जो एक-दूसरेके साथ ज्यादती करनेमें संकोच नहीं करते। लेकिन यदि पूरे परिणामको देखें तो मैं अनुभव करता हूँ कि दयाभाव और उदारतामें वृद्धि ही हुई है । हिन्दू और मुसलमान दोनों ही ईश्वरसे डरने लगे हैं। हम अदालतों और सरकारी स्कूलोंके मोहसे मुक्त हो गये हैं और हमारे मनमें अब कोई भ्रम शेष नहीं है । मैंने यह भी अनुभव किया है कि जिन लोगोंको हम निरक्षर और अज्ञान समझते हैं वे लोग ही शिक्षित कहे जाने योग्य हैं। वे हमसे अधिक संस्कृत हैं और उनके जीवन हमारे जीवनसे अधिक धर्ममय हैं । यदि हम लोगोंकी वर्तमान मनोवृत्तिका थोड़ासा भी अध्ययन करें तो हमें पता चलेगा कि लोक-कल्पनाके अनुसार स्वराज्य रामराज्यका पर्याय है जिसका अर्थ होता है भूतलपर धर्मराज्यकी स्थापना । यदि मेरे अछूत भाइयोंको मेरे इस कथनसे कुछ सन्तोष मिल सके तो मैं कहूँगा कि आपके मामले में जितनी बेचैनी मुझे पहले हुआ करती थी उतनी अब नहीं होती । इसका अर्थ यह नहीं कि मैं आपसे यह आशा करता हूँ कि आप सवर्ण हिन्दुओंके प्रति सन्देहशील होना बन्द कर दें। आपके साथ इतने अन्याय किये जानेके बाद यह कैसे Gandhi Heritage Portal