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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/६११

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परिशिष्ट ५८३ परवाह किये बिना, त्याग देनेको आमन्त्रित किया जाये । और उन्हें असहयोग आन्दोलन के सिलसिले में कोई विशेष सेवा करने या राष्ट्रीय संस्थाओंमें अपनी शिक्षा जारी रखनेकी सलाह दी जाये । (ग) सरकारसे सम्बद्ध या सरकारी अनुदानसे चलनेवाले स्कूलोंके न्यासियों, प्रबन्धकों और शिक्षकोंका तथा नगरपालिकाओं और स्थानीय निकायोंका इन स्कूलोंको राष्ट्रीय रूप देनेके लिए आह्वान किया जाये । (घ) वकीलोंसे वकालत बन्द करने और अपना ध्यान राष्ट्र सेवापर केन्द्रित करनेके लिए अधिक प्रयत्न करनेके लिए कहा जाये। वकीलों द्वारा अदालतोंका बहिष्कार तथा आपसी झगड़ोंका पंच-फैसलेसे निपटारा भी इस राष्ट्र सेवामें शामिल है । (ङ) भारतको आर्थिक दृष्टिसे स्वतन्त्र और आत्म-निर्भर बनानेके लिए सौदागरों और व्यापारियोंको आमन्त्रित किया जाये कि वे धीरे-धीरे विदेशी व्यापारका बहिष्कार करें, हाथ कताई और हाथ-बुनाईको प्रोत्साहन दें तथा उस दृष्टिसे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा नामजद विशेषज्ञोंकी एक समिति द्वारा आर्थिक वहिष्कारकी एक योजना तैयार की जाये । (च) और चूंकि असहयोगकी सफलताके लिए आत्म-त्याग आवश्यक है, इसलिए आम तौरपर देशके प्रत्येक वर्ग और प्रत्येक पुरुष तथा प्रत्येक स्त्रीका इस राष्ट्रीय आन्दोलनमें अधिकसे-अधिक आत्म-त्याग करनेके लिए आह्वान किया जाये । (छ) असहयोगकी प्रगतिमें तेजी लानेके लिए प्रत्येक गाँवमें या कुछ गाँवों के समूहमें एक-एक समिति संगठित की जाये और इन समितियोंके ऊपर प्रत्येक प्रान्तके मुख्य नगर में प्रान्तीय स्तरके केन्द्रीय संगठन बनाये जायें। (ज) भारतीय राष्ट्रीय सेवा नामसे एक संगठन स्थापित किया जाये जिसके लिए राष्ट्रीय कार्यकर्त्ताओंका एक दल तैयार किया जाये । (झ) उपर्युक्त राष्ट्रीय सेवा संगठन तथा आम तौरपर पूरे असहयोग आन्दोलनकी आर्थिक जरूरत पूरी करनेके लिए अखिल भारतीय तिलक स्मारक स्वराज्य कोष नामसे एक राष्ट्रीय कोष प्रारम्भ करनेके लिए कारगर कदम उठाये जायें। राष्ट्रने असहयोग कार्यक्रमको पूरा करनेकी दिशामें अबतक जो प्रगति की है, और खास तौरसे मतदाताओं द्वारा परिषदों के बहिष्कारके रूपमें जो प्रगति हुई है, उसके लिए यह कांग्रेस राष्ट्रको बधाई देती है और दावेके साथ कहती है कि जिन परिस्थितियोंमें इन परिषदोंकी रचना हुई है उनके कारण वे देशका प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, और साथ ही कांग्रेसको विश्वास है कि निर्वाचकोंके एक बहुत बड़े बहुमतके जान-बूझकर निर्वाचनमें शामिल न होनेके बावजूद जो लोग चुनाव लड़कर सदस्य बने हैं वे परिषदोंकी सदस्यता छोड़ देंगे और अगर वे लोकतन्त्रके सिद्धान्तकी सीधी उपेक्षा करके अपने-अपने निर्वाचकोंकी ऐसी स्पष्ट इच्छाके बावजूद परिषदोंमें अपने स्थान Gandhi Heritage Portal