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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 19.pdf/६१६

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५८८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय तो सर्वथा असंगत मानता ही हूँ, किन्तु आजकी स्थितिमें, जबकि प्रान्तीय सरकारोंकी जिम्मेदारी विशेष रूपसे भारतीयोंके हाथमें है और केन्द्रीय सरकारकी भी बहुत कुछ जिम्मेदारी भारतीयोंके हाथोंमें ही है, सरकारके लिए ऐसा विशेषण चुनना निश्चय ही एक बिलकुल गलत चुनाव प्रतीत होना चाहिए। लेकिन, खैर हम आगे बढ़ें। सुधारोंका शुभारम्भ कर दिया गया है और सरकारकी जिम्मेदारी बहुत अंशोंतक भारतीयोंको सौंप दी गई है । फिर यह कैसी विचित्र बात है कि वे ही लोग, जो वर्षोंसे सरकारके सूत्र संचालनमें अधिकाधिक हिस्सेकी माँग करते रहे हैं, आज बच्चोंकी तरह मचलते हुए उस जिम्मेदारीको स्वीकार करनेसे इनकार कर रहे हैं । अभी कुछ ही दिन पहले पढ़ते समय मेरी नजरोंसे एक अमरीकी चौपदा गुजरा। इस प्रसंगपर मुझे उसकी याद हो आई है। चौपदा इस प्रकार था : अम्मा, क्या मैं तैरने जा सकती हूँ ? हाँ प्यारी बिटिया, क्यों नहीं; अपने कपड़े हिकरीकी डालपर रख देना; लेकिन पानीके पास मत जाना।" " जहाँतक असहयोगियोंका सम्बन्ध है, मुझे तो यही लगता है कि इस चौपदेमें पूरी स्थितिका सार निहित है । और अब असहयोग आन्दोलनके सम्बन्धमें हमारी नीति क्या है, इसपर दो शब्द कहूँगा । सुधार और नई परिषदें हमारी नीतिके मुख्य आधार हैं । अब सरकारकी जिम्मेदारीमें भारतीय भी हाथ बँटा रहे हैं, इसलिए मेरा खयाल है कि सरकारका इस आन्दोलनको रोकने के लिए भारतीयोंसे सहायताकी अपेक्षा करना उचित ही होगा । असहयोगका प्रसार प्रचार-द्वारा ही किया जा रहा है; इसलिए हमारे लिए, हम अंग्रेजों और भारतीयोंके लिए शोभनीय यही है कि हम उसका प्रतिकार भी प्रचारके द्वारा ही करें। जहाँ-कहीं लोगोंको कोई शिकायत होती है, असहयोग आन्दोलन उसका लाभ उठाता है । तो इस हालतमें हमारे लिए उचित यही है कि हमसे जहाँतक बन पड़े उन शिकायतोंको दूर करनेकी कोशिश करें। जो लक्ष्य सामने रखकर असहयोग आन्दोलन शुरू किया गया था, उनमें से बहुत-से लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सके हैं। केन्द्रीय विधान सभामें अभी पिछले ही दिन एक प्रश्नका जो उत्तर दिया गया, उससे प्रकट होता है कि लोगोंका खिताब छोड़नेके लिए जो आह्वान किया गया था, उसका उनपर कितना कम असर हुआ है। केन्द्रीय विधान सभा और प्रान्तीय परिषदोंका अस्तित्व भी इसी बातको सिद्ध करता है कि इस मामलेमें भी असहयोग के प्रणेता जो चाहते थे वह नहीं हो सका । मुझे दुःख है कि बहुतसे ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने परिषदोंसे अलग रहना ही अपने लिए ठीक माना है । अगर परिषदोंको उनका सहयोग प्राप्त होता, अगर उनकी कार्यवाही में उन व्यक्तियोंके विचारोंका लाभ भी प्राप्त होता तो यह परिषदोंके हकमें बहुत अच्छा होता; फिर भी यह तो एक वास्तविकता है ही कि परिषदें गठित हुईं और अच्छे सदस्योंसे गठित हुईं तथा काम भी अच्छा कर रही हैं। अफगानिस्तानकी हिजरतके सिलसिले में भी असहयोगको लागू करनेकी कोशिश की गई थी। इस हिजरतके कारण इतने लोग मौतके मुँह गये, लोगोंकी Gandhi Heritage Portal