४८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय कि जरा-सा अभक्ष्य ले लो तो उस समय भी उसका इनकार करना लाजिमी है । इस प्रकार जिन्दगी कुर्बान करके अभक्ष्य छोड़कर अपनी प्रतिज्ञापर डटे रहनेवाले मनुष्यको ही जन्नतमें जानेपर खुदा 'शेरका बच्चा' कहेगा । दुनियाके तमाम धर्मो में प्रतिज्ञाके बारेमें ऐसी ही कठोर सख्ती है । सत्यकी प्रतिज्ञा ली हो तो गाँवको बचानेके लिए या किसी मनुष्यको बचानेकी खातिर आप असत्य नहीं बोल सकते । प्रतिज्ञा-भंगसे जो दुःख हुआ में उसे व्यक्त किये बिना नहीं रह सकता। कोई बूढ़ा खूसट आदमी अपनी प्रतिज्ञा तोड़े तो थोड़ा-बहुत समझमें भी आ सकता है; मैं स्वयं बूढ़ा ठहरा, इसलिए कोई भूल कर सकता हूँ । परन्तु आप तो नौजवान हैं, आपमें ताजा खून दौड़ता है, मैं आपको कैसे माफ कर दूं ? इस अवसरपर कुछ विषयान्तरका खतरा उठाकर भी मैं अपना अनुभव सुना रहा हूँ । अहमदाबादमें दो वर्ष पूर्व हजारों मजदूरोंने साबरमतीके किनारे एक पेड़के नीचे खुदाको हाजिर- नाजिर मानकर प्रतिज्ञा ली कि जबतक उनकी माँग मंजूर न हो, तबतक वे कामपर नहीं जायेंगे। बीस दिनतक वे टिके रहे। परन्तु बादमें मुझे महसूस हुआ कि वे गिरने जा रहे हैं; इसलिए मैंने उनसे कहा कि 'तुम गिरोगे तो में भी अन्न न लेकर शरीर छोड़ दूंगा। तुम प्रतिज्ञा न लेते तो हर्ज नहीं था, परन्तु लेकर तोड़ो, यह मुझे असह्य है। मजदूर रोने लगे, पैरों पड़ने लगे कि 'कुछ भी करके पेट भरेंगे, परन्तु पुराने कामपर नहीं जायेंगे।' इस प्रकार उन्हें गिरने से रोकने के लिए मुझे अनशनका व्रत लेना पड़ा था। आप मजदूरोंसे ज्यादा अशिक्षित न बनें; उनसे अधिक नास्तिक तो कदापि न बनें। आप इन्सानकी गुलामी छोड़कर खुदाकी गुलामी करें। इस हुकूमत - को मिटाना हो तो यह गुलामी छोड़नी पड़ेगी। प्रतिज्ञा नहीं लेंगे तो स्वराज्य नहीं मिलेगा, सो बात नहीं है; परन्तु आप प्रतिज्ञा तोड़ेंगे तो स्वराज्यका समय आगे अवश्य खिसक जायेगा । कसम तोड़नेवाले ऐसे विद्यार्थियोंकी मदद से मुसलमान मुसलमानोंकी मदद नहीं कर सकेंगे । इसलिए में विनयपूर्वक कहता हूँ कि कसम न लो, और कसम लो तो पृथ्वी रसातलमें चली जाये तो भी उसे न छोड़ो। आपमें से इने-गिने ही कसम लें, तो उससे भी स्वराज्य मिल जायेगा । मुसलमान विद्यार्थियोंके सामने इमाम हसन और हुसैन के उदाहरण मौजूद हैं । इस्लामको कायम रखनेवाली तलवार नहीं, ऐसी अटल टेकवाले जबरदस्त फकीर ही हैं। उन्हींके कारण वह कायम रहा है। एम० ए० हो जानेसे या सेवासमितिके स्वयंसेवक बननेसे या कांग्रेस में जाकर भाषण देनेकी शक्ति प्राप्त कर लेनेसे आप देशको स्वतन्त्र नहीं कर सकते। आप प्रतिज्ञाका आदर करके और उसका पालन करके ऐसा अधिक अच्छी तरह कर सकेंगे ।
इस राज्य और रावण - राज्य में फर्क नहीं है । कुछ फर्क हो भी तो वह इतना ही है कि रावणके हृदय में कुछ दया होगी, कुछ कम दगा होगी। उसने तो मन्दोदरीसे कहा था कि 'दस शिरवाला होकर भी क्या में रामका मुकाबला नहीं कर सकता ? तू तो पागल हो गई है।' उसने यह भी कहा कि ' में जानता हूँ कि वे अवतारी पुरुष हैं और मुझे मालूम है कि मैं इतना बुरा हो गया हूँ कि उनके हाथसे मारा जाऊँ, Gandhi Heritage Portal