हैं। यदि शिक्षक-अध्यापक न मिलें, तो आप अपने अध्यापक स्वयं बनें और अपने ही पैरोंपर बड़े हो जायें। मेरी, मोतीलालजीकी या शौकत अलीकी ताकतपर खड़े रहतेकी आगासे आना चाहें, तो जहाँ आप हैं, वहीं बने रहें।
आप पूछेंगे 'आज प्रह्लाद कहाँसे लायें?' 'प्रह्लाद इस जमानेमें भी हैं।'[१]
में कोई नशा (एक्साइटमेंट) नहीं देना चाहता। आपकी तालीमका नशा आपके लिए काफी है।[२] में आपमें शान्त साहस फूंकना चाहता हूँ। में यह चाहता हूँ कि आपका हृदय कुर्बानी और तपश्चर्याके योग्य पवित्र बने।
सही बात यह है कि माँ-बाप बच्चोंको नहीं रोक रहे हैं, बच्चे ही माँ-बापके कहनेपर भी पाठशाला छोड़ने को तैयार नहीं हैं। हिन्दू यूनिवर्सिटीमें मैने सी-डेढ़ सौ लड़कोंसे पूछा था। उन्होंने कहा कि हमारे माँ-त्रापकी हमें इजाजत तो है ही, ये हमें हर हालत में खर्च देनेको भी तैयार हैं। कोई कुछ भी कहे; सरकार द्वारा चलनेवाले स्कूल-कालेजों में पढ़ते रहना पाप है. यदि आपकी आत्मा ऐसा कहती हो तभी आप उन्हें छोड़ें। थोड़ी भी दुविधा हो, तो आप मालवीयजीकी सलाह मानें। मुझे तो अभी भारतमें पाँच वर्ष ही हुए हैं; मालवीयजीने तो सारा जीवन देशकी सेवामें अर्पित किया है। इसलिए कहता हूँ कि मेरी आवाज ही आपकी आत्माकी आवाज न हो, तो आप मालवीयजीकी बात मानें। मेरी आवाज ही आपकी आवाज हो तो मालवीयजीकी सलाह भी हरगिज न मानें।
- [गुजरातीसे]
- नवजीवन, १९-१२-१९२०