अपील : मिल-मालिकोंसे ३४५ उपलब्धि और माँगके नियमको प्रस्तुत करेंगे एवं इस प्रकार हालत जितनी खराब अब है उससे भी ज्यादा खराब हो जायेगी। वे मुझसे कहते हैं कि वे विदेशी कपड़ेका व्यापार खुशीसे छोड़ देंगे परन्तु इस शर्तपर कि उन्हें इस बातका विश्वास दिला दिया जाये कि आप लोग उपलब्धि और माँगके नियमकी बात नहीं उठायेंगे और कीमतें न बढ़ाना अपना कर्त्तव्य समझेंगे । सन् १९१९ में आपमें से कुछ लोगोंने मुझसे यह कहा था कि यदि आप कीमतें न भी चढ़ायें तो भी फायदा उपभोक्ताको नहीं बल्कि बीचके लोगोंको होगा और वे लूट मचायेंगे । मेरा खयाल है कि आप जैसे बुद्धिमान व्यवसायियोंके लिए यह तर्क देना अशोभनीय है । आप अपने बनाये हुए मालके व्यापार- को, जबतक वह उपभोक्ताओं तक न पहुँचे, भलीभाँति नियन्त्रित कर सकते हैं । आपको तो इतना ही करना है कि आप अपने व्यापारमें थोड़ी-सी राष्ट्रीय भावनाका समावेश करें । मैं यह नहीं कहता कि आप परोपकार करें, यद्यपि आप व्यापार करते हुए परोपकारकी भावना भी रखें तो इसमें अनुचित कुछ भी नहीं होगा। लेकिन मैं यह प्रार्थना अवश्य करता हूँ कि आप अपने व्यापारको विशुद्ध स्वार्थके बजाय राष्ट्रीय आधारपर चलायें। कोई आदमी महज इसलिए कि वह अपने और अपने हिस्सेदारोंका खयाल रखनेके साथ-साथ राष्ट्रका भी खयाल रखता है कम व्यवसायकुशल नहीं हो जाता। इसलिए मेरा आपसे अनुरोध है कि असहयोग के सम्बन्धमें अपने विचारोंको कोई क्षति पहुँचाये बिना यह आश्वासन अवश्य दें कि यदि विदेशी मालके प्रस्तावित बहिष्कार के कारण माँग बढ़ गई तो आप केवल उसी बातको लेकर अपने कपड़े के भाव नहीं बढ़ायेंगे और इस सम्बन्धमें व्यापारियों और उपभोक्ताओंको डरनेकी कोई जरूरत नहीं है । देशको आपसे कमसे कम इतनी अपेक्षा रखनेका अधिकार तो है ही । आपका विश्वस्त मित्र, मो० क० गांधी [ अंग्रेजीसे ] बॉम्बे क्रॉनिकल, ६-७-१९२१ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३७७
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