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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३७९

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पत्र : महादेव देसाईको ३४७ फिर कभी ऐसा न हो । तथापि मैं निम्नलिखित सुझाव देता हूँ । प्रत्येक एकादशीको सिर्फ एक सेर, ८० तोला, गर्म दूध पर रहो । न फल लो, न शक्कर । और वह दूध भी दो या तीन बारमें पियो, एक ही बारमें नहीं । अगली एकादशीसे ऐसा एक वर्षतक करो । श्रीमद् राजचन्द्रजीके' लेखोंको पढ़ जाना और उनपर विचार करना । तुलसीदासकी 'मणिरत्नमाला' पढ़कर उसपर मनन करना । भर्तृहरिके 'वैराग्यशतक' को पढ़ उसपर अच्छी तरहसे विचार करना । 'योगवासिष्ठ' का वैराग्य प्रकरण खूब ध्यानसे पढ़ जाना । हर रोज कमसे कम एक घंटा चरखा कातना और उस समय हमेशा यह विचार करना कि इस यज्ञके द्वारा मनकी मलिनता धुल जाये। यह भी एक वर्षतक करना, यात्रा और बीमारी अपवाद हैं। सवेरे उठनेपर अन्य समस्त कार्य बादमें करना । सवेरे उठ शौचादि करना हो तो वह करके, यदि आश्रममें हो तो प्रार्थना करके, आध घंटेतक चुपचाप उपर्युक्त पुस्तकोंका पाठ करना और बादमें एक घंटा चरखा चलाना । इसके बाद कुछ और काम करना । एक वर्षके लिए नौ बजनेसे पहले सो जाना और चार बजने के बाद बिस्तरपर कतई न रहना। इस कार्यक्रममें परिवर्तन तभी हो सकता है जब तुम बीमार पड़ो । इस प्रायश्चित्तका विधान करते समय मैं दोषको बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कहता और न ही मैं उसको कम मानता हूँ। इसमें से तुम्हें जो कुछ निकालना हो उसे निकाल देना । लेकिन लोक-लाजके अधीन होकर चरखेको मत निकालना । और लोक-लाज अथवा लोक-सेवाके विचारसे नौ बजे सोना मत छोड़ना । 'इंडिपेंडेंट' को आड़े नहीं आने देना । ... दैनिकके लिए लिखने के लिए रातको जागने की जरूरत नहीं है । और फिर जिस शैलीसे हम चलाना चाहते हैं उसमें ऐसा कुछ नहीं है । और जान लो कि ऊपरका डेढ़ घंटा तो मौनका ही है। देवदासने निर्दोष भावसे तुम्हारे पत्रको पढ़ना शुरू किया, इससे उसे रोकना मुझे उचित नहीं लगा । तुमने न आनेका जो कारण दिया है वह सबल है इसलिए चाहो तो मत आओ । पण्डितजी अथवा जोसेफ भेजें और आओ, यह अलहदा बात है । तुम्हारे न आनेकी मुझे चिन्ता नहीं; लेकिन अगर आ जाते तो मुझे खुशी ही होती । तुम्हारे दोषको देखनेपर मेरे प्रेममें कोई कमी आ जायेगी, ऐसा तो तुम कभी नहीं मानोगे। मैं पूर्ण होऊँ तो कमीको अवकाश नहीं हो सकता। मैं अपूर्ण मुमुक्षु अगर दूसरोंके दोषोंको बढ़ा-चढ़ाकर देखूं तो अपनी अपूर्णता में वृद्धि करूँगा । मैंने नित्य स्मरण करनेके लिए कहा है तथापि ग्लानि नहीं होनी चाहिए। शुद्ध पश्चात्ताप ग्लानिका विरोधी है। पाप लम्बा मुँह बनाता है । मलिनताका स्मरण हमें विनम्र बनाता है, ग्लानि कभी नहीं देता । १. श्रीमद् राजचन्द्र, जिनका गांधीजीपर बहुत प्रभाव पड़ा; देखिए खण्ड १३, पृष्ठ १४६ । Gandhi Heritage Portal