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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३८०

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३४८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय 'सुख दुःखे समेकृत्वा " की बात यहाँ भी लागू होती है । गुजराती पत्र (एस० एन० ११४२९) की फोटो - नकलसे । बापूके आशीर्वाद १६१. कपड़े व्यापारियोंको खुला पत्र सज्जनो, ७ जुलाई, १९२१ कल मैंने मिल मालिकोंको विदेशी कपड़ेके बहिष्कार आन्दोलन में सहायता देने के लिए निमन्त्रित किया था । सम्भव है वे सहायता दें, शायद न भी दें। आशा तो यही है कि वे सहायता देंगे। लेकिन आपका इस आन्दोलनसे अलग रह सकना असम्भव है, क्योंकि आपमें से अधिकतर लोग असहयोग में पक्का विश्वास रखनेवाले हैं। आपके सहयोगसे तिलक स्मारक - कोष के सम्बन्ध में हमारी बेजवाड़ामें की गई प्रतिज्ञाकी पूर्ति सम्भव हुई है। लेकिन आप कहेंगे कि चन्दा देना तो हमारे लिए एक छोटी-सी बात थी किन्तु हमारा व्यापार हमारे लिए जीवन-मरणका मामला है। इसी प्रकारके भ्रमके कारण हमें स्वराज्य नहीं मिल रहा है। यदि आपका व्यापार आपके लिए जीवन-मरणका मामला है तो क्या देशका हित आपके नजदीक उससे कम महत्त्व रखता है ? स्वराज्यका अर्थ यह है कि मैं और आप लोग निजी व्यापारसे देश के व्यापारको अधिक महत्त्व दें। दूसरे शब्दों में आपसे विदेशी कपड़ा न मँगानेका जो अनुरोध किया गया है वह इस बातका अनुरोध है कि आप देशके लाभसे अपने लाभको कम महत्त्व दें । आप इंग्लैंड, जापान या अमेरिकासे जो कपड़ा मँगाते हैं उसके प्रत्येक गजपर आप अपने देशवासियोंसे कमसे-कम तीन आने छीन लेते हैं और बदलेमें उन्हें कुछ नहीं देते। मैं यह बात स्पष्ट करके कहूँ । भारतमें बहुत मजदूर हैं जो गाँवोंमें बेकार पड़े हुए हैं। पहले ये बेकार मजदूर सूत और कपड़ा तैयार करनेमें लगे हुए थे । विदेशी कपड़े के आयातके फलस्वरूप वे अनिवार्यत: बेकार बन गये और इस लम्बे अरसेमें उनमें से बहुतेरोंको कोई दूसरा धन्धा नहीं मिल पाया। इसी कारण जब-जब भारतमें अनावृष्टि होती है तब-तब दयार्द्र व्यक्तियोंके हृदय काँप उठते हैं । ऐसा होनेकी जरूरत नहीं है । भारतमें अनावृष्टि कोई असाधारण बात नहीं है । हमको उसके इतना घातक होनेका अनुभव इसलिए होता है कि हम करीब-करीब भूखों मर रहे हैं। लम्बी बेकारी- के फलस्वरूप अपना निर्वाह करते रहनेकी हमारी शक्ति क्षीण हो गई है । आप यह खयाल न कीजिए कि झोंपड़ियोंमें रहनेवाले ये करोड़ों लाचार लोग सबके सब हमारे दर्जनभर शहरोंमें, जहाँ मजदूरोंकी कमी है, इकट्ठे होकर अपनी रोजी कमा सकते १. भगवद्गीता, २-३८ । Gandhi Heritage Portal