कपड़े के व्यापारियोंको खुला पत्र ३४९ हैं। उनके ऊपर जमीनका भार है और वे इच्छा रहते हुए भी अपनी जमीनको नहीं छोड़ सकते । भारतके तमाम शहरोंमें भी ये करोड़ों लोग समा नहीं सकते। उनकी आँखोंमें चमक हाथ-कताई और हाथ-बुनाईके धन्धेकी पुनः स्थापनासे ही आ सकती है, अन्यथा नहीं। और यदि मैं आपसे यह न कहूँ कि भारतकी गहरी और दुःख- जनक दरिद्रता के लिए मिल-मालिकोंकी अपेक्षा व्यापारी अधिक उत्तरदायी हैं तो मैं अपने प्रति और देश के प्रति कर्त्तव्य पालनसे च्युत माना जाऊँगा । इसमें सन्देह नहीं कि जब मिल-मालिक ऊँची कीमतें वसूल करते हैं तो वे इस दरिद्रताको और भी भीषण बना देते हैं । लेकिन इसके लिए आप इतने उत्तरदायी हैं कि यदि आप विदेशी कपड़े का आयात बन्द कर दें तो आप हाथ - कताईके प्राचीन और सम्मानपूर्ण धर्मको पुनरुज्जीवित कर सकते हैं। और हाथ-बुनाई के उद्योगको उत्तेजन दे सकते हैं । आखिर जिस व्यापारसे भारतको हानि पहुँच रही है उसको छोड़ना आपमें- से बहुतेरोंके लिए जीवन-मरणका मामला क्यों होना चाहिए ? निश्चय ही आपमें इतनी सूझ-बूझ है कि आप कोई दूसरा ऐसा व्यापार खोज निकाल सकते हैं जो आपके लिए और देशके लिए समान रूपसे लाभप्रद हो । आयात बन्द करनेका अर्थ है प्रति वर्ष ६० करोड़ रुपये बाहर जानेसे बचा लेना । लेकिन इसका अर्थ इससे कहीं ज्यादा बड़ी पूँजीको यहाँ व्यवहारमें लाना है । इसका अर्थ यह है कि रुईकी समस्त प्रक्रियाएँ भारत में ही पूरी की जायें। इसमें आपके लिए व्यापारकी गुंजाइश है । इसका अर्थ हैं कि इस समय दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई मात्रामें जो धन हमारे प्यारे देशसे बाहर जा रहा है वह नहीं जायेगा और वह देशके व्यापार में लगेगा । मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप अपनी तीक्ष्ण बुद्धिकी मददसे इसे अनुचित कामोंमें लगाना बन्द करके ऐसे हितकर काममें लगायें जो आपके लिए सुलभ हो सकते हैं। आपको हाथ कताई और हाथ-बुनाईके उद्योगका संगठन अवश्य करना चाहिए। तब आप मेरी तरह मोटी- झोटी खादीसे सन्तुष्ट नहीं होंगे। आप अपने कतैयोंसे बारीकसे-बारीक सूत कातनेका और बुनकरोंसे ढाकाकी विश्वविख्यात मलमल बुननेका आग्रह करेंगे। आप इसमें बड़ी- बड़ी पूंजी लगायेंगे। परन्तु मैंने तो अपनी बहनोंको केवल कुछ हजार रुपये दिये हैं, जो आपसे मुझे दान में मिले थे । आपके लिए इस विदेशी कपड़े के अपवित्र व्यापारको छोड़नेका अर्थ है हाथ-कते सूतके उत्पादन और वितरणका संगठन करना । यह उद्योग आपकी देशभक्ति के अनुरूप है। शायद आप यह कहें कि ऐसा संगठन करनेमें कुछ साल लग जायेंगे । आपने अपना वर्तमान व्यापार एक क्षणमें तो नहीं जमा लिया है। यदि आपको यह विश्वास हो गया है कि यह ऐसा व्यापार है जिसने भारतको गरीब और गुलाम बनाया है, तो आप इसके नष्ट होनेके परिणामोंपर विचार करनेके लिए नहीं रुकेंगे। आप कैसी भी हानि उठाकर इसकी इतिश्री हो जाने देंगे। और इसमें हानि ही क्या है ? बहुत तो नहीं है। आपको विदेशी कपड़े और सूतके सब नये ऑर्डर रोक देते हैं। इसमें कुछ खर्च नहीं होता । आपके पास विदेशी कपड़ा जमा है जो आपको खपाना है। इसकी खपत के लिए संसारका बाजार आपके लिए खुला पड़ा है । भारतकी जरूरतकी कपड़े की खास किस्में मारिशस, दक्षिण आफ्रिका या पूर्व आफ्रिका जैसे देशोंमें कई कामोंमें प्रयुक्त की जा सकती हैं। आप Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/३८१
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