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टिप्पणियाँ ३७१ यूरोपीय द्वारा एक खानसामाके मारे जाने और अदालत द्वारा उसपर ३००) रु० जुर्माना किये जानेका जिक्र था । टिप्पणी, जिसपर ऐतराज किया गया है, सचमुच कड़ी है। उसमें कहा गया है कि ब्रिटिश अदालतें यूरोपीयोंको ३००) रु० जुर्माना भर कर भार- तीयोंकी हत्या करनेकी छूट देती हैं । किन्तु उसमें हिंसाको कोई उकसावा नहीं है, और अखबारोंमें छपनेवाली उन कई घटनाओंसे जिनमें न्यायपर कुठाराघात हुआ है, वह उचित ठहरती है । सरकारको कोई भान नहीं है कि यूरोपीयों और भारतीयोंके बीच समान रूपसे न्याय एक असम्भव-सी बात माननेकी भावना भारतीयोंके दिलमें कितनी गहरी बैठ गई है । 'जमींदार' के विरुद्ध चौथा इलजाम मौलाना मुहम्मद अलीके उस वक्तव्यको छापने का है जिसमें अफगानिस्तान के होएका जिक्र है । सम्पादकों और सार्व- जनिक नेताओंसे क्षमा-याचना के लिए कहनेका यह विचार अली भाइयोंकी क्षमा- याचनाका मजाक बनाना है, क्योंकि संयुक्त प्रान्तकी सरकार भी 'इंडिपेन्डेन्ट' पत्र और दूसरे लोगोंसे इसी प्रकार क्षमा-याचनाकी माँग कर रही है। मुझे मालूम नहीं कि सरकार द्वारा आत्मसम्मानी असहयोगियोंसे क्षमा-याचनाकी मॉंगका इलाहाबादमें क्या परिणाम हुआ । ज्यादा ईमानदार और सम्मानजनक तरीका यह होता कि सरकार जिन असहयोगियोंको पसन्द नहीं करती, उन्हें जेल भेज देती । पंजाब में सरकारने हमारी बेइज्जती करनेका जो ढंग अपनाया था, उससे हटकर अब क्षमा- याचनाकी माँग करने का यह घुमावदार तरीका उसे नहीं अपनाना चाहिए । सहयोग और असहयोगकी परिभाषा देश के लिए यह कोई छोटी बात नहीं कि श्री द्विजेन्द्रनाथ ठाकुर जिन्हें उनके मित्र प्यारसे 'बड़ो दादा' कहते हैं, अपनी वृद्धावस्था और शान्तिनिकेतनके अपने एकान्त- में भी, देशमें जो-कुछ हो रहा है उसपर बारीकीसे निगाह रखते हैं। श्री एन्ड्रयूजने असहयोगपर प्रकट किये उनके हालके विचारोंका स्वतन्त्र अनुवाद जगह-जगह भेजा है । यद्यपि यह अनुवाद पूराका पूरा अखबारोंमें छपा है, मैं श्री ठाकुर द्वारा की गई सहयोग और असहयोगकी परिभाषाओंको, जो इतनी ही सच्ची और प्रभावपूर्ण हैं, प्रकाशित करनेका लोभ संवरण नहीं कर सकता । सहयोग के बारेमें लिखते हुए वे कहते हैं : हमारे शासकोंने अपने निरंकुश कृत्योंको दुनियासे छिपाने के लिए विधान- मण्डलोंके रूपमें एक कठपुतलीका तमाशा खड़ा किया है जिनमें सहयोग देनेके लिए कुछ पेशेवर भाषण-शूरोंको आमन्त्रित किया गया है। हमारे शासकों का विचार है कि ऐसा करके उन्होंने हमें हमेशा के लिए अपने अहसानसे दबा दिया है। दरअसल उन्होंने जलेपर नमक छिड़का है। ये विधान-मण्डल हमारे गले पड़ गये हैं और डर यह है कि सिन्दबाद नाविककी कहानीमें वर्णित बूढ़ेकी भाँति वे हमारा दम घोट देंगे। बड़ो दादा आगे कहते हैं : यदि हमारे अंग्रेज शासकोंके अनुसार सहयोगका यही अर्थ है, तो यह समझ पाना बहुत कठिन नहीं कि असहयोगका हमारे लिए क्या अर्थ है । हम कोई भी ऐसी चीज, जो Gandhi Heritage Portal