सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४१०

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

________________

३७८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय अत्याचार किये हैं । मेरे लेखे तो इन दोनों अत्याचारोंका प्रतिकार करना उत्तरदायित्व की सबसे बड़ी कसौटी है । खिलाफत के प्रति जो अन्याय हुआ है उसे स्वीकार किया गया है | पंजाबपर किये गये अत्याचार खून के अक्षरोंमें लिखे गये हैं । हम मानते हैं कि हमने अमृतसर, कसूर, जलियाँवाला तथा गुजरांवाला में गलतियाँ कीं । किन्तु इसके लिए हमें भारी कीमत चुकानेके लिए मजबूर किया गया। हमारा अपमान किया गया, हमें ठोकरें मारी गईं। अपराधी और निर्दोष, सभी फॉसीपर चढ़ाये गये । हमने स्वयं कई स्थानोंपर स्पष्ट एवं मुक्त रूपसे अपना अपराध स्वीकार किया है । हम यह नहीं चाहते कि अन्याय करनेवाले अधिकारियोंको अपमानित किया जाये । हम तो केवल यह माँग करते हैं कि वे हमपर मालिक बनाकर न लादे जायें। एक अंग्रेज अधिकारीने एक बार मुझसे स्पष्ट कहा कि माइकेल ओ डायर या जनरल डायरका नाम पेंशनकी सूची से हटाने की बातपर सहमति देनेके बजाय मैं नौकरी छोड़ देना अधिक अच्छा समझँगा । मैंने उससे कहा कि मैं आपके इस प्रकार के रुखसे सहानुभूति रख सकता हूँ; किन्तु आप भी मुझसे इस विचारसे सहमत होनेकी आशा न रखें और उसने ऐसी आशा नहीं की। हजारों न सही सैकड़ों अंग्रेज पुरुष तथा महिलाएँ माइकेल ओ डायर तथा जनरल डायरको साम्राज्योद्धारक और अपने गौरवका संरक्षक समझते हैं। यह भी सम्भव है कि यदि मैं भी, चाहे जिस मूल्यपर, भारतको अधीन रखनेके लिए कृतसंकल्प अंग्रेजों में से एक होता तो मैं भी शायद उन्हींके जैसा महसूस करता । किन्तु मेरा विचार है, जबतक इस प्रकारका रुख बना रहेगा तबतक सरकार और जनता के बीच सहयोग नहीं हो सकता । हमारे द्वारा असहयोग होनेपर अंग्रेज इस तथ्यको समझ जायेंगे कि देश के प्रशासनमें उनके साथ सहयोग करनेका अर्थ हम लोग उनके इस रुख के साथ सहमति प्रकट करना मानते हैं। यह मित्रों और साथियों जैसा रुख नहीं है और तलवारके बलपर उनका भारतमें बने रहना अब सम्भव नहीं है। वे यहाँ केवल हमारी सद्भावनाके बलपर रह सकते हैं। यदि हमें अब कोई चीज जोड़े रह सकती है तो वह केवल सद्भावनाकी कड़ी ही हो सकती है। मुँहसे समानताका दम भरना और वास्तवमें अलगावकी खाइयाँ खोदकर अपने बड़प्पनको अक्षुण्ण रखना तो हमारा मजाक उड़ाना ही है। लॉर्ड रीडिंग संसार के बुद्धिमान् व्यक्तियोंमें से हैं, इस- लिए मुझे आशा है, वे इस बातको जल्दी ही समझ जायेंगे कि दो विरुद्ध रुखोंमें संगति बनाये रखना सम्भव नहीं है । यदि कोई बीचका मार्ग होता तो असहयोगियोंने उसे कभीका अपना लिया होता । यह विशाल जनसमुदायकी घृणा या दुर्भावनाका प्रश्न नहीं है । मैं उन्हें आमन्त्रित करता हूँ कि वे गहरे पैठकर देखें तो उन्हें मालूम हो जायेगा कि हम कमजोर होनेपर भी गोरी जातिकी श्रेष्ठताको अब किसी प्रकार भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं । जबानी जमा-खर्चका चाहे कितना ही अच्छा मतलब क्यों न हो और चाहे कितनी ही सचाईसे वह क्यों न किया गया हो, उससे कोई उपयोगी उद्देश्य सिद्ध नहीं हो सकता । हम भारत के लोग इतने मूर्तिपूजक तो हैं कि जिस समानता की बात कही जाती है हमें उसका साक्षात् प्रमाण चाहिए। गोरे सैनिकोंका अस्तित्व अंग्रेज जातिकी रक्षाके लिए आवश्यक हो सकता है, किन्तु क्या वे यह नहीं जानते कि भारतकी सीमाकी रक्षा के लिए उनकी बिलकुल आवश्यकता । Gandhi Heritage Portal