शासन प्रणालीसे घृणा कर सकते हैं, तब मेरे कुछ भारतीय मित्र मुझपर कपटाचारका दोष मढ़ते हैं। मैं उन्हें यह बतानेकी कोशिश कर रहा हूँ कि किसी भी व्यक्तिके लिए अपने भाईकी दुष्टतासे घृणा करनेपर भी अपने भाईसे घृणा न करना सम्भव है। ईसाने स्क्राइब्स[१] और फैरिसियोंकी[२] दुष्टतासे घृणा करनेपर भी उनसे घृणा नहीं की थी। उन्होंने व्यक्तिके प्रति प्रेम और उसकी बुराईके प्रति घृणाका कानून केवल अपने लिए नहीं बनाया, बल्कि यह सिखाया कि इसका सार्वजनिक व्यवहारमें उपयोग करें। वस्तुतः संसारके सभी धर्म-ग्रंथोंमें मैंने इसका उल्लेख पाया है।
मैं दावा करता हूँ कि मुझे मानवीय स्वभाव तथा अपनी कमजोरियोंका काफी हदतक सही ज्ञान है। अनुभवसे मैंने यह जाना है कि अपने ही द्वारा प्रस्तुत प्रणालीकी अपेक्षा आदमी स्वयं अच्छा होता है। और इसलिए मैं अनुभव करता हूँ कि वैयक्तिक रूपमें आप उस प्रणालीसे बहुत अच्छे हैं जिसे आपने संघके रूपमें विकसित किया है। १० अप्रैलके दिन अमृतसरमें मेरा प्रत्येक देशभाई जिस भीड़में शामिल था उससे अच्छा था। वह एक व्यक्तिके रूपमें उन निर्दोष अंग्रेज बैंक मैनेजरोंकी हत्या करनेसे इनकार कर देता। किन्तु उस भीड़में बहुतसे आदमी अपनेको भूल गये। इसीलिए दफ्तरमें बैठा अंग्रेज उससे बाहरके अंग्रेजसे भिन्न है। इसी प्रकार भारतमें रहनेवाला अंग्रेज, इंग्लैंडमें रहनेवाले अंग्रेजसे भिन्न है। यहाँ भारतमें आप जिस प्रणालीसे सम्बन्धित हैं वह इतनी निकृष्ट है कि उसका वर्णन ही नहीं हो सकता। अतः मेरे लिए यह सम्भव है कि मैं आपको बुरा समझे बिना तथा प्रत्येक अंग्रेजपर बुरे उद्देश्यका दोष मढ़े बिना कठोरसे-कठोर शब्दोंमें उक्त प्रणालीकी निन्दा कर सकूँ। इस प्रणालीके आप भी उतने ही गुलाम हैं जितने कि हम। इसीलिए मैं चाहता हूँ कि आप भी मेरे प्रति ऐसा ही व्यवहार करें और मुझपर उन इरादोंका दोष न मढ़ें जो आपको मेरे लिखित शब्दोंमें उपलब्ध न हों। मैं जब यह कहता हूँ कि मैं उस प्रणालीको विनष्ट करने या सुधारनेके लिए अधीर हूँ जिसने भारतको आपके मुट्ठी-भर देशवासियोंका गुलाम बनाया है और जिसके कारण अंग्रेज भारतमें अपनेको किलों तथा उन तोपोंकी छायामें ही सुरक्षित अनुभव करते हैं जो यहाँ इस देशमें जहाँ-तहाँ दर्शकोंका ध्यान अपनी ओर बरबस खींचती हैं तो आप समझ लीजिए कि अपने इस कथनमें मैं पूरी तरह अपना इरादा आपके सामने रख चुका। यह आपके और हमारे लिए एक अपमानजनक दृश्य है। राजविधि द्वारा गठित हमारा जीवन पारस्परिक अविश्वास और भयपर आधारित है। आप स्वीकार करेंगे कि यह इन्सानियत नहीं है। जिसके कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। उस प्रणालीको राक्षसी ही कहना होगा। आप भारतीयोंका अखण्ड भाग बनकर भारतमें रह सकते हैं, विदेशी शोषक बनकर सदा नहीं रह सकते। एक अंग्रेजकी जानके बदले १,००० भारतीयोंकी जानें! यह एक अत्यन्त निराशाजनक सिद्धान्त है, लेकिन आप मुझपर