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पत्र : भारतके अंग्रेजोंके नाम ३८१ विश्वास कीजिए, भारतमें आपके उच्चतम अधिकारियोंने १९१९ में इस सिद्धान्त की घोषणा की थी । मैं आपसे यह कहने के लिए लालायित हूँ कि आप आगे बढ़ें और इस प्रणालीको विनष्ट करने में मेरा हाथ बँटायें, जिसने हमें और आपको नीचे गिरा दिया है। किन्तु मैं अनुभव करता हूँ कि अभी ऐसा सम्भव नहीं है । हमने स्वयं उसे समाप्त करने के लिए पर्याप्त तत्परता, आत्मत्याग और आत्मसंयम नहीं दिखाया है । किन्तु मैं आपसे इतना जरूर कहता हूँ कि आप विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कार तथा मद्यनिषेध आन्दोलनमें हमारी सहायता करें। लंकाशायरका कपड़ा जैसा कि ब्रिटिश इतिहासकारोंने बताया है, भारतपर जबर- दस्ती लादा गया और जान-बूझकर व्यवस्थित रूपसे उसके विश्व प्रसिद्ध उत्पादकों को नष्ट कर दिया गया । इसलिए भारत न केवल लंकाशायर बल्कि जापान, फ्रांस और अमरीकाकी दयापर भी निर्भर है। हम कपड़े के लिए प्रतिवर्ष (न्यूनाधिक रूपमें) ६० करोड़ रुपये भारतसे बाहर भेजते हैं । हम अपने कपड़ोंके लिए काफी मात्रामें रुई पैदा करते हैं। क्या यह पागलपन नहीं है कि रुई भारतसे बाहर भेजी जाये और वहाँ उससे कपड़ा तैयार करके फिर जहाज द्वारा हमारे पास वापस ले आया जाये ? क्या भारतका इस निःसहाय अवस्थातक पहुँचाना सही था ? डेढ़ सौ साल पहले हम अपना सारा कपड़ा तैयार करते थे । हमारी महिलाएँ अपनी झोपड़ियोंमें बारीक सूत कातती थीं और अपने पतियोंकी कमाईमें वृद्धि करती थीं। गाँवके जुलाहे उस सूतसे कपड़े बुनते थे । हमारे जैसे विशाल कृषिप्रधान देशमें यह राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्थाका अपरिहार्य अंग था । इसके कारण हम अपने खाली समयका स्वाभाविक ढंगसे उपयोग कर सकते थे। आज हमारी महिलाएँ अपने हाथोंकी कुशलता खो बैठी हैं और लाखों लोगोंपर जबरदस्ती थोपी गई इस निष्क्रियताने देशको गरीब बना दिया है । बहुतसे जुलाहोंने भंगीका काम सँभाल लिया है । कुछने किराये के सिपाही बननेका पेशा अपना लिया है । कलाकार जुलाहोंकी आधी जाति नेस्तनाबूद हो गई है और आधे बचे-खुचे जुलाहे हाथ-कता बारीक सूत न मिलनेके कारण आयात किये गये विदेशी सूतसे कपड़े बुन रहे हैं । अब शायद आप समझेंगे कि भारतके लिए विदेशी कपड़ेके बहिष्कारका क्या अर्थ है । इसकी योजना बदला लेनेकी दृष्टिसे नहीं बनाई गई है। यदि सरकार आज खिलाफत तथा पंजाबके साथ किये गये अत्याचारोंका प्रतिकार कर दे और भारतको तुरन्त स्वराज्य देनेकी अनुमति दे दे, फिर भी बहिष्कार आन्दोलन निश्चित रूपसे चलता रहेगा । स्वराज्यका अर्थ है कमसे कम इतना अधिकार प्राप्त करना जिससे राष्ट्रके आर्थिक अस्तित्व के लिए महत्त्वपूर्ण भारतीय उद्योगोंकी रक्षा हो सके और आर्थिक अस्तित्वको खतरा पहुँचानेवाले आयातोंको बन्द किया जा सके । कृषि और चरखा राष्ट्र रूपी शरीरके दो फेफड़े हैं। किसी भी कीमतपर उनके क्षयको बचाना नितान्त आवश्यक है । इस मामलेपर अब लिखनेकी आवश्यकता नहीं । जब कृषिके सहायक विशाल परिमाणमें उत्पादन करनेवाले एक ऐसे व्यवसायके अभाव में सारा राष्ट्र भूखसे मर Gandhi Heritage Portal