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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४३४

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

मुझे आशा है कि अन्य मिल-मालिक भी श्री अम्बालालका अनुकरण कर स्वदेशी आन्दोलनमें सहायक होंगे।

कपड़ेके व्यापारियोंने तो मुझे यहाँतक बताया है कि कपड़ेके वर्तमान भाव न बढ़ाये जायें [वे घटाये जाने चाहिए]। वे आज तो जापानी मिलोंके मालके भावोंकी अपेक्षा भी ऊँचे हैं। मिल-मालिकोंको इस सम्बन्धमें सलाह करके कोई निर्णय अवश्य करना चाहिए।

उनको यह जाँच करनी चाहिए कि देशमें कितने कपड़ेकी जरूरत है। उसको देखकर ही उन्हें दूसरे देशोंसे कपड़ेके आर्डर लेने चाहिए। यहाँसे दूसरे देशोंको सूत भी बहुत जाता है। उसके निर्यातमें भी आवश्यक फेरफारकी जरूरत होगी। सम्भव है कि इस मामलेमें और भी अधिक विचार करनेकी जरूरत हो। कुछ लोगोंको ऐसा लगेगा कि दूसरे देशोंके लोगोंको हमारे कपड़ेकी जबतक माँग है तबतक जितना कपड़ा हम आजतक उनको देते आये हैं उतना तो हमें उनको देना ही पड़ेगा। हमारी स्थिति इंग्लैंडकी स्थितिसे भिन्न है। इंग्लैंड और हमारे बीचके व्यापारमें एक तरहकी जबरदस्ती है। शायद दूसरे देशोंके साथ हमारे व्यापारमें यह जबरदस्ती न हो। दूसरे देशोंके साथ हमारे व्यापारिक सम्बन्धोंका मामला एक भिन्न और नाजुक मामला है। तीन बातोंके बारेमें कोई सन्देह नहीं है। अफीमका व्यापार नितान्त अनीतियुक्त है। इस सम्बन्धमें भारत सरकारने जो अन्याय किया है उसमें हम पूरी तरह शामिल रहे हैं। इसमें हमने चीनको नुकसान पहुँचाकर जो पाप किया है वह तो सदा हमारे सिर रहेगा ही। जबतक हिन्दुस्तानकी आवश्यकता पूरी नहीं होती तबतक यहाँसे अन्न और कपास बाहर भेजना ही नहीं चाहिए। इसके विपरीत हमारे देशसे बहुत-सा अन्न लड़ाईके समय बाहर भेजा गया। कपासके सम्बन्धमें हमने कितना बड़ा अपराध किया है उसका ज्ञान तो हमें आगे चलकर होगा।

मिल-मालिकोंसे हमें जो आखिरी मदद माँगनी है वह है मालकी शुद्धताके सम्बन्धमें। उन्हें विदेशी सूतका बना माल देशी कहकर नहीं बेचना चाहिए और कपड़ेमें बेहद माँड़ी नहीं लगानी चाहिए। मुझे आशा है कि मालिक आपसमें सलाह करके इन बातोंके सम्बन्धमें ऐसा निर्णय करेंगे जिससे देशके हितकी रक्षा हो।

किसका फायदा?

असहयोगसे धनी लोगोंके सिवा और किसको लाभ पहुँचेगा। असह्योगमें दंगे-फसाद या लड़ाई-झगड़े हुए तो उनमें कौन-कौनसे लोग शामिल होंगे?

इस तरहके दो प्रश्न एक पत्र-लेखकने पूछे हैं। यदि असहयोगसे गरीबोंको फायदा न पहुँचा तो उससे किसीको भी फायदा नहीं पहुँच सकता। असहयोगसे किसी भी योग्य संस्था अथवा व्यक्तिको हानि नहीं पहुँचेगी; बल्कि उससे सभीको लाभ पहुँचेगा। यह शस्त्र ऐसा है जिससे गरीबसे-गरीब आदमीके अधिकारकी रक्षा होगी।

असहयोगमें दंगे-फसाद या लड़ाई-झगड़े होते ही नहीं; इसलिए उनमें कौन भाग लेगा यह प्रश्न ही नहीं उठता। यदि असहयोगमें दंगे-फसाद या लड़ाई-झगड़े हों तो वह असहयोग नहीं रह जाता। वहाँ असहयोग समाप्त हो जाता है। यदि देशमें दंगे-फसाद