बैठकमें भाग ले रहे थे। वहाँ एक महिला मित्रको बैठकमें एक मुसलमानको देखकर आश्चर्य हुआ। उसने उनसे पूछा कि वे बैठकमें कैसे पहुँच गये? मेरे मित्रने उनको बतलाया कि बैठकमें उपस्थित होनेके दो बड़े-बड़े और दो छोटे-छोटे कारण थे। बहुत छोटी आयुमें ही उनके पिता मर गये थे और वे जो-कुछ भी बन पाये हैं वह सब अपनी माताके कारण ही। फिर उनका विवाह भी ऐसी स्त्रीसे हुआ जो जीवनमें उनकी वास्तविक सहभागिनी सिद्ध हुई। और उनके कोई पुत्र नहीं था, केवल चार पुत्रियाँ हैं और वे सभी छोटी-छोटी हैं और वे स्वयं एक पिताके नाते चाहते हैं कि वे अधिकसे-अधिक उन्नति करें। ऐसी स्थितिमें नारी-आन्दोलनमें उनके भाग लेनेपर किसीको कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आगे उन्होंने कहा कि मुसलमानोंपर यह दोषारोपण किया जाता है कि वे स्त्रियोंके प्रति उदासीन रहते हैं। इससे अधिक गलत और अपमानपूर्ण कथन हो ही नहीं सकता। इस्लामी कानूनमें स्त्रियोंको समान अधिकार दिये गये थे। पर उनके खयालसे पुरुषने ही अपनी वासनाके लिए स्त्रीको पतिता बना दिया है। उसने स्त्रीकी आत्माकी प्रशस्ति करनेके बजाय उसके शरीरकी प्रशस्ति आरम्भ कर दी, और वह अपनी इस चालमें इतना ज्यादा सफल रहा कि आज स्वयं स्त्री यह महसूस नहीं कर पाती कि वह भी मात्र शारीरिक श्रृंगारसे प्रेम करने लगी है जो एक तरहसे उसकी दासताकी ही निशानी है। और यह कहते-कहते उनका गला रुँध गया कि यदि ऐसा नहीं तो क्यों बहनोंको अपने शरीरका साज-श्रृंगार करनेमें ही सबसे अधिक आनन्द आता है? क्या हम पुरुषोंने उन स्त्रियोंकी आत्माको ही बिलकुल कुचल नहीं दिया है? नहीं, उन्होंने अपने ऊपर काबू पाते हुए कहा कि वे सिर्फ इतना ही नहीं चाहते कि नारियाँ औपचारिक स्वतन्त्रता प्राप्त करके ही रह जायें, बल्कि उन्हें अपने बन्धनोंको भी तोड़नेमें समर्थ होना चाहिए, जिनमें उन्होंने स्वयंको अपनी इच्छासे जकड़ लिया है और इसीलिए उन्होंने तय कर लिया है कि वे अपनी पुत्रियोंको बड़ी होनेके बाद स्वतन्त्र रूपसे कोई काम करने योग्य बनायेंगे।
इस सुविचारपूर्ण वार्ताका और अधिक ब्यौरा देनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं पत्र-लेखिकासे यही कहूँगा कि वे मुसलमान मित्रकी इस वार्ताके मुख्य विचारके विषयमें मनन करें और इस समस्याको हल करनेकी कोशिश करें। स्त्रीको स्वयंको पुरुषकी वासना-तृप्तिका साधन समझना बन्द कर देना चाहिए। इसका इलाज उसके अपने ही हाथमें ज्यादा है। यदि वह पुरुषके समान उसकी सहभागिनी बनना चाहती है तो उसे पुरुषके लिए और अपने पतिके लिए भी अपने शरीरका साज-श्रृंगार करनेसे इनकार कर देना चाहिए। मैं सीताके विषयमें इस प्रकार कभी सोच भी नहीं सकता कि उन्होंने रामको रिझानेके लिए शारीरिक साज-श्रृंगारपर एक क्षण भी नष्ट किया होगा।
यंग इंडिया, २१-७-१९२१