हमेशा स्वदेशी-व्रतका पालन किया। यदि उनके रहते खादी बनाई जाती तो वे उसे बिना हिचकिचाहटके पहनते। मैं तो विश्वास ही नहीं कर सकता कि साज-सज्जाकी अभिलाषा उन्हें छू भी सकती थी। आप लोगोंसे मेरी अपील है कि श्री तिलककी स्वदेशी भावनाका अनुकरण करें। परन्तु यह अनुकरण अनमने भावसे न करें। मैंने सुना है कि जिन स्त्रियोंने जूनमें अपने स्वदेशी प्रेमका इतना अच्छा परिचय दिया था वही अब अपनी विदेशी साड़ियोंको दे डालने में संकोच कर रही हैं। मैं उन गहनोंको नहीं भूल सकता जो एक पारसी बहनने पारसी सभामें मेरे पास भेजे थे। मैं चाहता हूँ कि स्त्रियाँ स्वदेशीका काम इसी भावनासे जारी रखें। यदि यह काम उन्हें कठिन लगता हो तो श्री तिलकका उदाहरण सामने रखें। अपने वस्त्रोंकी खाली अलमारियोंको देख-देखकर आँसू बहानेका समय नहीं है। मैं आशा करता हूँ कि बम्बईके नागरिक अपना समस्त विदेशी कपड़ा त्याग देंगे और खादी पहनकर पहली अगस्तका दिन मनायेंगे। इसके बाद उन्होंने श्रीमती सरोजिनी नायडूसे भाषण देनेके लिए कहा।
बॉम्बे क्रॉनिकल, २४-७-१९२१
२१२. टिप्पणियाँ
चोर और डाकुओंका भय
खेड़ा जिलेमें चोर और डाकुओंका भय हमेशा बना रहता है। इनका थोड़ा-बहुत डर तो दूसरी जगहों में भी है। स्वराज्य लेनेका अर्थ आत्मरक्षा करना भी है। दूसरे लोग हमारी रक्षा करें और हम स्वराज्यका उपभोग करें, ऐसा नहीं हो सकता। लोगोंमें आत्मरक्षाकी शक्ति होनी ही चाहिए। यह शक्ति दो प्रकारसे आती है। एक तो हम चोरों और डाकुओंको चोरी करने और माल लूटने दें; इसका अर्थ है हम कोई सम्पत्ति ही न रखें। दूसरे हम चोरों और डाकुओंको दण्ड दें। सभी लोग अपनी सम्पत्ति गँवानेके लिए अथवा कोई सम्पत्ति न रखने के लिए तैयार नहीं होते। इसीलिए वे चोरों और डाकुओंको दण्ड देकर रोकनेका उपाय करते हैं। कोई चौकीदार रखता है और कोई स्वयं ही उनसे लड़ाई करता है। चोरों और डाकुओंसे लोगोंकी रक्षा करना राजाका एक मुख्य कार्य होता है। लोग जब अपनी रक्षा आप करना सीख लेंगे तभी स्वराज्य होगा। इसलिए हममें यह शक्ति आनी चाहिए। यह काम कुछ कठिन नहीं है। गाँवों और शहरोंमें लोग अपने स्वयंसेवक तैयार कर सकते हैं और पहरा दे सकते हैं। हर गांवमें रोशनीका इन्तजाम होना चाहिए। यदि हम इतना ही कर लें तो भी चोरोंका भय बहुत कुछ दूर हो जायेगा।
किन्तु इस कामके साथ-साथ और इससे भी ज्यादा जोरसे तो सुधारका काम किया जाना चाहिए। चोरोंसे बचाव करना जितना जरूरी है उसकी अपेक्षा चोरोंको