भाइयो और बहनो, २१३. भाषण : सान्ता क्रूज, बम्बई में २४ जुलाई, १९२१ मैं आज यहाँ बहुत बड़ा लालच लेकर आया हूँ । मुझसे कल भाई विठ्ठलदासने कहा था कि बम्बई में जितनी तेजीसे पैसा इकट्ठा हुआ था, उतनी तेजीसे विदेशी कपड़ा इकट्ठा करनेका काम नहीं चल रहा। यदि किसी जगहसे इस कामकी अच्छी शुरुआत हो सके तो बहुत उत्साहसे काम चलेगा; फिर और लोग भी अच्छा उत्साह दिखायेंगे । रुपया इकट्ठा करनेके सम्बन्धमें कामकी शुरुआत माटुंगा की गई थी । परन्तु विदेशी कपड़ा इकट्ठा करनेके सम्बन्ध में आमन्त्रणकी भिक्षा माँगनेका काम मैंने सान्ता क्रूजसे शुरू किया है और यह आमन्त्रण मुझे भिक्षामें मिला है। स्वदेशीके प्रचारका काम सितम्बर से आरम्भ हुआ है; फिर लोगोंको यह काम नया शुरू हुआ क्यों लगता है ? कांग्रेसने स्वदेशी के प्रचारका प्रस्ताव सितम्बर में पास किया था। इसे खिलाफत समितिने तो पहले ही स्वीकार कर लिया है। मौलाना मुहम्मद अलीके साथ मैं तभीसे स्वदेशीका प्रचार कर रहा हूँ। मैं जहाँ-जहाँ घूमा हूँ वहाँ-वहाँ मैंने इस सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट किये हैं। यदि हम खिलाफत के सम्ब- न्धमें कोई निर्णय करा सकेंगे तो हममें स्वराज्य लेनेकी शक्ति आ जायेगी। किन्तु स्वदेशीको पूरी तरह स्वीकार किये बिना यह शक्ति नहीं आयेगी । चरखा हर घरमें होना चाहिए। स्वदेशीके दो अंग हैं - (१) विदेशी कपड़ेका बहिष्कार और (२) उसके स्थानमें देशी कपड़ेका उत्पादन । यदि इस समय सारा कपड़ा मिल ही तैयार करें तो स्वराज्य नहीं मिल सकेगा । तो हम उसे कायम नहीं सकेंगे, ऐसी मेरी मान्यता है । जबतक भारतमें घर-घर चरखा न चलेगा तबतक स्वराज्य नहीं मिलेगा । हमारे आन्दोलनके तीन मुख्य अंग हैं -- स्वदेशी, हिन्दू-मुस्लिम एकता और शान्ति । इन तीनों कामोंमें से पहला अर्थात् स्वदेशी हिन्दू, मुसलमान और पारसी सभीके लिए है । भारतमें ईस्ट इंडिया कम्पनी जब व्यापार करनेके लिए आई थी यदि हमने तब स्वदेशी कपड़ेका त्याग न किया होता और इंग्लंडसे आनेवाली मलमल और छींटपर न ललचाये होते तो उसके बादका हमारे देशका इतिहास आज दूसरी तरह ही लिखा गया होता। इस समय तो हम फिर स्वदेशीको ग्रहण करनेपर ही स्वराज्य ले सकते हैं। और यदि हम हिन्दुओं और मुसलमानोंमें ऐक्य न रख सकें अथवा देशकी शान्तिको भंग कर दें तो हम स्वराज्य भी खो देंगे। हमारी मनोरचना ही ऐसी हुई है कि हम हमेशा शान्तिकी कामना करते हैं । स्वराज्य मिलनेपर कोई किसीको हानि नहीं पहुँचायेगा, यही नहीं बल्कि स्वराज्य लेने और उसे कायम रखनेकी ये जरूरी शर्तें हैं । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४७४
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