४५० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय कहकर क्या मैं सम्राट्के विरुद्ध सभी प्रकारके आरोप लगा सकता हूँ ? क्या में ऐसे आरोप लगानेके बाद उनसे ऐसे स्पष्ट निष्कर्ष निकाल सकता हूँ जिनसे महामहिम सम्राट्को बहुत अधिक क्षति पहुँचती हो ? मैंने इस बातको इस प्रकार मोटे तौरपर केवल यही दिखानेके लिए रखा है कि मैं ब्रिटिश साम्राज्यके सर्वोच्च भद्र पुरुषकी प्रसिद्धिको कायरतापूर्वक कलुषित करनेके कारण अभद्र व्यवहार करनेका दोषी होऊँगा और कानूनके अनुसार सभ्य समाजसे तत्काल निकाला जा सकूंगा । इस मामले में इन हानिकर आरोपोंके शिकार संयोगसे दो सभ्य और वीर भारतीय हैं, और आरोपकर्त्ता एक यूरोपीय पत्रकार है, क्या इससे कुछ अन्तर पड़ जाता है ? श्री गणेश सावरकरने अपने सम्मानपर लगाये गए इन दूषित आरोपोंपर क्षमा-याचना कर लेने मात्र से सन्तोष कर लिया है, यद्यपि वह क्षमा-याचना भी सच्चे मनसे की गई नहीं जान पड़ती है, और मुकदमा चलानेका अपना अधिकार उदारतापूर्वक छोड़ दिया है। ऐसा करके वे देशके लोगोंकी दृष्टिमें और भी ऊँचे उठ गये हैं। श्री सावरकरके वकीलोंको दिये गये उत्तरमें इस पूर्णतः अक्षम्य आचरणके सम्बन्धमें बहाना प्रस्तुत किया गया है। जब- तक सम्पादक अफवाहोंकी बारीकी से छानबीन न कर ले और उनके सचाईपर आधारित होनेका विश्वास न कर ले तबतक न्याय और ईमानदारीका थोड़ा-सा भी खयाल रखने- वाला समाचारपत्र अफवाहोंको प्रचारित नहीं कर सकता । मुझे आशा है कि अंग्रेजी और हिन्दी के समाचारपत्र इस बातपर गम्भीरतासे विचार करेंगे और 'कैपिटल' के सम्पादकको यह अनुभव करा देंगे कि उन्होंने एक सम्मानित पत्रकारके अयोग्य आचरण करनेका अपराध किया है । विदेशी कपड़े क्यों जलाएँ ? आलोचकोंने विदेशी कपड़े जलाने के सम्बन्धमें मुझे बेहद झिड़कियाँ दी हैं । विदेशी कपड़े जलाने के विरुद्ध प्रस्तुत किये गये प्रत्येक तर्कपर विचार करनेके बाद मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि विदेशी कपड़ेसे छुटकारा पानेका सबसे अच्छा तरीका उसको नष्ट कर देना ही है । प्रान्तीय कांग्रेस कमेटीने यह बात विदेशी कपड़ा देनेवाले व्यक्तियोंकी इच्छापर छोड़ दी है कि वे विदेशी कपड़ेको नष्ट कर दें या भारतसे बाहर स्मरना या कहीं अन्यत्र भेज दें। इसलिए यदि विदेशी कपड़े से छुटकारा पानेका एकमात्र तरीका उनको नष्ट करना ही बताया गया होता तो इस प्रश्नका जितना महत्त्व होता उसका उतना महत्त्व अब नहीं रहता । विदेशी कपड़े को नष्ट करनेका औचित्य इस बात- पर निर्भर करता है कि किसी व्यक्तिका विदेशी कपड़ेको छोड़ देनेकी आवश्यकतामें कितना तीव्र विश्वास है । जिस प्रकार शराब न पीनेवाला मनुष्य अपने शराब के गोदामकी शराब अपने जरूरतमंद पड़ोसीको नहीं दे देता, उसी प्रकार यदि कोई स्वदेशीका भक्त उस शराब न पीनेवाले मनुष्य के समान ही बहुत उत्कट भावना रखता है तो वह अपने बक्स में रखे विदेशी कपड़े गरीबोंको नहीं देगा । मेरा विचार है कि भारतमें विदेशी कपड़े पहनना लगभग शराब पीनेके समान ही बुरा है । मैं इस बारेमें निश्चित कुछ नहीं कह सकता कि वह कुछ मानीमें शराब पीनेसे भी अधिक बुरा नहीं है । पिछले डेढ़ सौ वर्षोंसे भारत में विदेशी कपड़ा आ रहा है और उससे कताई के हमारे महान् Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४८२
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