टिप्पणियाँ ४५१ कुटीर उद्योगको हानि पहुँच रही है। जैसा कि श्री रमेशचन्द्र दत्तने अपनी भारतके कताई और बुनाई उद्योगोंके विचारपूर्ण और सुनियोजित विनाशके इतिहासका अध्ययन पुस्तकमें बताया है, जो बिहार भारतका अत्यन्त समृद्ध प्रान्त था, वह अब अपने बुनाई और कताईके समृद्ध उद्योगके आयोजित और क्रूरतापूर्ण विनाशके कारण निर्धन हो गया है। यदि हम यह अनुभव ही कर लें कि ईस्ट इंडिया कम्पनीने कितनी हानि पहुँचाई है और हमने कम्पनीके गुमाश्तोंके अत्याचारोंके सामने या अपने आगे रखे गये प्रलोभनोंके सामने झुककर कितना बड़ा पाप किया है तो हमारे सिर लज्जाके कारण नीचे हो जायेंगे । यदि हम स्वदेशी वस्तुओंका व्यवहार करते रहते तो हमारा महान् राष्ट्रीय उद्योग नष्ट ही न होता, हमारी स्त्रियोंको विवश होकर सार्वजनिक सड़कोंपर मजदूरी न करनी पड़ती और हमारे लाखों करोड़ों लोगोंको विवश होकर वर्ष में कुछ समय बेकार न बैठना पड़ता । मेरा यह विनम्र मत है कि जिस कपड़ेसे ऐसी दुःखजनक स्मृतियाँ जाग उठती हैं और जो हमारे लिए लज्जा और पतनका चिह्न है उसे नष्ट कर देना ही ठीक है। वह निश्चय ही गरीबोंको नहीं दिया जा सकता । जो वस्तु हमारे लिए दासताका चिह्न है उसे उनको देकर हम उनकी सहायता कर रहे हैं, ऐसा सोचनेकी अपेक्षा हमें उनकी भावनाओं और उनकी राष्ट्रीय शिक्षा-दीक्षा- का अधिक खयाल करना चाहिए। क्या भारत के गरीब लोगों में देशभक्तिकी भावना नहीं होनी चाहिए? क्या उनमें हमारे ही समान आत्मगौरव और आत्मसम्मानकी भावनाएँ नहीं होनी चाहिए? मैं यह नहीं चाहता कि हममें से कोई तुच्छसे तुच्छ मनुष्य भी ऐसा हो जिसमें सच्ची देशभक्तिकी भावना न हो। हम उन्हें सड़ा-गला भोजन या ऐसा भोजन जिसे हम नहीं खाना चाहते, देते हुए भयसे सहमते हैं या हमें सहमना चाहिए; ठीक वैसे ही भावका अनुभव हमें उन्हें विदेशी कपड़ा देते समय भी करना चाहिए। एक क्षण विचार करें तो यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि हम जिन बारीक कपड़ोंको फेंक रहे हैं उनमें से ज्यादातर गरीबों के लिए बिलकुल बेकार हैं । वे पसीनेकी बदबूसे भरी हुई हमारी गन्दी टोपियोंको और हमारी छोड़ी हुई कीमती रेशमी साड़ियों और अत्यन्त बारीक मलमलका क्या उपयोग कर सकते हैं ? जो लोग इन्हें पहनते थे वे इनसे प्रेम करते थे; उनके अतिरिक्त अन्य लोगोंके लिए इनका कोई मूल्य नहीं है। उनसे अकाल पीड़ित लोगोंके शरीर नहीं ढँके जा सकते । इनमें उनके उपयोगकी वस्तुएँ तो वास्तवमें बहुत ही कम हैं । परन्तु जब में यह तर्क देता हूँ कि विदेशी कपड़ा नष्ट कर देना चाहिए तब मेरे इस तर्कका आधार यह नहीं होता कि जो कपड़ा फेंका गया है वह बेकार है । मेरा तर्क तो इससे भी अधिक गहरा जाता है क्योंकि वह उस एकमात्र भावनापर आधारित है जो हमारी श्रेष्ठतम भावनाको बल देती है और दे सकती है। एक अंग्रेजको जीर्ण-शीर्ण झंडेके प्रति किये गये अपमानपर क्यों रोष प्रकट करना चाहिए ? परन्तु वह उसपर रोष प्रकट करता है, और वह यह ठीक ही सोचता है कि उसे ऐसा करना चाहिए। मैं एक क्षणके १. १८४८-१९०९; भारतीय शासन सेवाके सदस्य इकनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया सिंस द एडवैन्ट ऑफ द ईस्ट इंडिया कम्पनीके लेखक; १८९९ में लखनऊ कांग्रेसके अध्यक्ष । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४८३
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