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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४८९

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हिन्दू-मुस्लिम एकता ४५७ कष्ट सहन करते हैं और किसी पुरस्कारकी अपेक्षा नहीं रखते, तब हमारी दुःखभरी पुकार ऊँची उठती है और ईश्वर उसे सुनता एवं उसका उत्तर देता है। धर्मका पथ यही है और यदि उसपर एक भी मनुष्य पूरे मनसे चलता है तो उसे उसका फल मिलता है । मैं तो यहाँतक कहता हूँ और मेरी इस बातका खण्डन नहीं किया जा सकता कि गायकी जान बचाने के लिए भी, अपने ही साथी, मनुष्यकी हत्या करना हिन्दू धर्म नहीं है । हिन्दू धर्म एक सच्चे हिन्दूको स्वधर्मकी खातिर अर्थात् गोरक्षाके निमित्त स्वयं कष्ट सहनेका आदेश देता है। क्या हिन्दू मुसलमानोंसे सौदा करने के बजाय उनकी खातिर और उनके धर्मकी खातिर मरनेके लिए तैयार हैं? यदि हिन्दू इस प्रश्नका उत्तर धर्म-भावसे देंगे तो वे सदाके लिए मुसलमानोंको अपना मित्र बना लेंगे और सदाके लिए गायकी रक्षा भी कर लेंगे। हमें इन मुसलमान भाइयोंके बड़ेसे- बड़े नेताओंसे भी कोई बड़ी आशा नहीं करनी चाहिए। वे हमारी थोड़ी सहायता करने के अलावा और क्या कर सकते हैं। जो लोग दीर्घकालसे गोवध करते आ रहे हैं और ऐसा करते हुए जिन्होंने हिन्दुओंके मनोभावोंका तनिक भी खयाल नहीं किया है, ये नेता उनके हृदयोंको एकाएक बदल देनेका जिम्मा नहीं ले सकते । परन्तु ईश्वर सर्वशक्तिमान् है; वह क्षणमें उनकी चित्तवृत्ति बदल सकता है और उसमें दया-भाव- का संचार कर सकता है। यदि प्रार्थनाके साथ-साथ कष्टसहन भी हो तो वह प्रार्थना हृदयकी प्रार्थना हो जाती है। ईश्वर केवल उसी प्रार्थनाको सुनता है । अब मैं अपने मुसलमान भाइयोंसे दो शब्द कहना चाहता हूँ । उन्हें अनुत्तरदायी या अज्ञानी किन्तु धर्मान्ध हिन्दुओंके कामोंसे चिढ़ नहीं जाना चाहिए। जो उत्तेजित किये जानेपर संयम रखता है, विजय उसीकी होती है। उन्हें यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि जिन हिन्दुओंमें जरा भी दायित्वकी भावना है वे इस समय मुसलमानोंका साथ किसी लाभके भावसे प्रेरित होकर नहीं दे रहे हैं। उनका यह विश्वास है कि खिला- फत के बारेमें मुसलमानोंकी माँग न्यायोचित है, और इस अच्छे काममें मुसलमानोंकी सहायता करना भारतकी सेवा करना है, क्योंकि मुसलमान भी इसी भारत-भूमिसे पैदा हुए हैं और परस्पर भाई-भाई हैं । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, २८-७-१९२१ Gandhi Heritage Portal