२२०. अहिंसा मेरा विश्वास है कि हम अपने उद्देश्यके निकट पहुँच गये हैं, परन्तु जब विजय बहुत निकट दिखाई देती है तभी अधिकतम जोखम रहता है । किसीको जब भी कोई उल्लेखनीय विजय मिलती है उसे उससे पहले समस्त पूर्व प्रयत्नोंसे बड़ा एक अन्तिम प्रयत्न और करना पड़ता है । ईश्वर जो अन्तिम परीक्षा लेता है वह सदा कठिनतम होती है । शैतानका अन्तिम प्रलोभन सर्वाधिक मोहक प्रलोभन होता है। यदि हम स्वतन्त्र होना चाहते हैं तो हमें ईश्वरकी अन्तिम परीक्षामें उत्तीर्ण होना पड़ेगा और शैतानके अन्तिम प्रलोभनको अमान्य करना पड़ेगा । अहिंसा असहयोगका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और अभिन्न अंग है। यदि हम अहिंसक बने रहें तो हम अन्य सब बातोंको छोड़ देनेपर भी अपना स्वतन्त्रता संग्राम चलाते रह सकते हैं । परन्तु यदि हम अहिंसापर कायम नहीं रहेंगे तो हम बुरी तरह हारेंगे। हमें यह याद रखना चाहिए कि हिंसा तो वह आधारशिला है जिसपर सत्ताकी इमारत टिकी है। चूँकि हिंसा सरकारका अन्तिम सहारा है, और उसका अन्तिम आश्रय है, इसलिए उसने लोगोंके सभी प्रकार के हिसात्मक प्रयत्नोंको व्यर्थ करनेकी तैयारी कर ली है और इस प्रकार यदि हम हिंसा करें तो उसने अपने-आपको उससे पूर्ण सुरक्षित रखनेका प्रबन्ध कर लिया है। इसलिए हिंसाका आश्रय लेना अत्यन्त सक्रिय रूपसे सरकार के साथ सहयोग करना है। यदि हमने किसी भी प्रकारकी हिंसा की तो वह हमारी मूर्खता और दुर्बलताभरी नाराजीकी निशानी होगी । गम्भीरतम उत्ते- जनाके बीच भी संयम बनाये रखना योद्धापनकी सबसे सच्ची निशानी है । युद्ध-कलामें सर्वथा नौसिखुआ मनुष्य भी यह जानता है कि उसे उन स्थानोंसे बचना चाहिए जहाँ शत्रु घात लगाये हों। क्योंकि खरे सैनिककी तो यह कसौटी ही है कि वह हर तरहकी उत्तेजनासे अपनेको बचाये रखनेकी सावधानी बरते । अलीगढ़की घटना इस बातका उदाहरण है । यह बात बहुत साफ दिखाई देती है कि वहाँ पुलिसने लोगोंको उत्तेजनाका काफी कारण दिया था । हम यह बात बहुत पहले ही जान चुके हैं कि ऐसा करना उसका काम है। अलीगढ़ के लोग अपने लिए बिछाये गये जाल में फँसकर उत्तेजित हो गये और उन्होंने आगजनी की। अभीतक यह ठीक-ठीक मालूम नहीं हुआ है कि बिना वर्दीके सिपाहीको मारा किसने । यह साबित करनेकी जिम्मेदारी लोगोंकी है कि यह काम उन्होंने नहीं किया है । हमें अपने प्रति कठोर होना चाहिए। यदि हम सीधे और तंग रास्तेसे जाना चाहते हैं (जो अवश्य ही सबसे छोटा रास्ता है), तो हमें अपने प्रति दयालु नहीं होना चाहिए। हम किसी भी दुर्घटनाका दोष बदमाशोंपर नहीं डाल सकते। उनके कामों के लिए हमें जिम्मेदार होना चाहिए। यदि यह असम्भव हो तो हमें कह देना चाहिए कि हम स्वराज्यके अयोग्य हैं । हमें उनपर भी नियन्त्रण रख सकना चाहिए Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४९०
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