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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/४९२

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४६० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय प्रकार हम हिंसात्मक प्रतिकार नहीं कर सकते, उसी प्रकार हम दमन किये जानेपर कमजोर न हों, भले ही वह दमन कितना ही कठोर या कष्टकर क्यों न हो । संयुक्त प्रान्तकी एक विश्वसनीय अफवाह है कि तीन या चार प्रसिद्ध कार्य- कर्त्ताओंने जेल जीवनको बहुत अधिक कष्टप्रद पाया, अतः कुछ कामोंको न करनेका वचन दे दिया और जेलसे छूट गये । यदि यह बात सच है तो यह खेदजनक है । हमें चट्टानकी तरह दृढ़ होना चाहिए। हमें पीछे नहीं हटना चाहिए। भारतकी जेलोंमें हमें जो भी कष्ट उठाने पड़ें हममें उनको खुशीसे सहन करने की सामर्थ्य होनी चाहिए। हमें सरकारसे कोई आशा नहीं करनी चाहिए। हमें उससे यही आशा करनी चाहिए कि वह बुरासे-बुरा जितना कर सकती है करेगी, फिर चाहे वह कानूनके अनुसार हो, चाहे उसके खिलाफ । उसका एकमात्र उद्देश्य हमको झुकाना है, क्योंकि वह अपने आपमें सुधार करना नहीं चाहती। मैं सरकार के बारेमें कठोर मत नहीं दे रहा हूँ । धारवाड़ और अलीगढ़की घटनाएँ सरकार द्वारा शिष्टताका उल्लंघन किये जानेकी सबसे ताजी मिसालें हैं । यदि मैं विश्वास करूँ तो एक दूसरी अफवाह यह है कि संयुक्त प्रान्तकी एक जेलमें एक बहादुर मुसलमान कैदीको एक अँधेरी कोठरी में बन्द कर दिया गया और तीन दिन- तक तेज बदबू में रखा गया। जिस मनुष्यने मुझे सूचना दी उसने मुझसे पूछा कि जो व्यक्ति इस तेज बदबूको सहन न कर सके उसे क्या करना चाहिए। मैंने कठोरता से किन्तु विचारपूर्वक उत्तर दिया कि फिर भी उसे क्षमा नहीं माँगनी चाहिए, उसे अत्या- चारीकी इच्छा के सामने झुक जानेकी अपेक्षा अपना सिर जेलकी दीवारोंसे मारकर फोड़ लेना चाहिए। यह मेरा कोई ऐसा मत नहीं है जिसे मैं व्यर्थ ही प्रकट कर रहा हूँ, बल्कि ये मेरे दक्षिण आफ्रिकाके दिलचस्प छुटपुट अनुभव हैं। दक्षिण आफ्रिका में जेलका जीवन सुख-सुविधापूर्ण नहीं था । बहुत-से कैदियोंको तनहाईकी सजा भुगतनी पड़ती थी। सैकड़ोंको सफाईका काम करना पड़ता था । अनेक लोगोंने उपवास किये । एक स्त्री जब जेलसे छोड़ी गई तब वह हड्डियोंका ढाँचा ही रह गई थी, क्योंकि जो कुछ भी वह खा सकती थी वह जेलके अधिकारी उसे देते नहीं थे । परन्तु वह स्वाभिमानिनी और दृढ़ थी। दक्षिण आफ्रिकामें जिन हजारों लोगोंने सजा भोगी, उनमें से शुरूमें एक या दो अपवादोंको छोड़कर मुझे ऐसे एक भी कैदीका उदाहरण याद नहीं आता जिसने जेलसे छूटनेके लिए किसी प्रकारकी कमजोरी दिखाकर माफी मांगी हो । पारसी रुस्तमजी, इमाम अब्दुल कादिर बावजीर, थम्बी नायडू और अन्य बहुतसे लोगोंने जिनके नाम मैं बता सकता हूँ, कभी पीछे पाँव नहीं हटाया। बल्कि वे बार- बार जेल गये । तपस्वियों के रक्तदान के बिना स्वतन्त्रताके मन्दिरका निर्माण नहीं हो सकता । अहिंसाकी पद्धति सबसे त्वरित, निश्चित और सर्वोत्तम है। हमें कांग्रेस के और खिलाफत के सम्मेलनोंमें की गई अपनी प्रतिज्ञाके प्रति सच्चे बने रहना चाहिए, और विजय बिलकुल पास है । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, २८-७-१९२१ Gandhi Heritage Portal