टिप्पणियाँ ५०९ ये प्रदर्शन मैत्रीपूर्ण प्रदर्शन हैं और इसलिए कोई झंझट खड़ी नहीं होती। किन्तु सोचिए अगर हम विरोधमें कोई प्रदर्शन करें तो कैसी अंधाधुंधी मच जाये । अगर हमें गोली- बारीके समय या लोगोंके उत्तेजित रहते हुए भीड़की व्यवस्था करनी पड़े तो क्या हो ? मैंने टूंडलामें देख लिया है कि ऐसी भीड़को लेकर सार्वजनिक सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाना असम्भव है । जबतक हम भीड़के लोगोंको आदेश देने और उनका पालन करानेकी स्थितिमें नहीं आ जाते, तबतक हम किसी भी कामको कारगर ढंगसे अंजाम नहीं दे सकते । इसलिए हमारे स्वयंसेवकोंको भीड़को नियन्त्रित रखनेका प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। भारतीय लोगोंकी भीड़को नियन्त्रणमें रखना और व्यवस्थित बनाना अत्यन्त ही सरल कार्य है । यह संसारके अन्य सभी देशोंके लोगोंको नियन्त्रणमें रखनेसे कहीं आसान है। हाँ, इसके लिए पहलेसे तैयारी की जानी चाहिए। और यदि पहलेसे तैयारी न हो तो समझदारी इसीमें होगी कि भीड़का जमाव ही न होने दिया जाये । प्रदर्शन अब यह समझना काफी आसान हो गया है कि मालेगांवमें और यहाँ तक कि अलीगढ़में भी आगजनीकी घटनाएँ कैसे हुई होंगी । अनुशासनहीन भीड़ वहाँ इकट्ठी हो गई थी। ऐसी भीड़में कुछ ऐसे शरारती लोग रहते ही हैं जो सिर्फ मौकेका इन्त- जार करते रहते हैं । जब समूची भीड़ उत्तेजित हो जाती है तो वह आँख मूंदकर उनके पीछे चलने लगती है; अर्थात् वह भीड़ क्षणिक आवेशमें बह जाती है। इसी- लिए जब हम ऐसे प्रदर्शनोंका आयोजन करते हैं जिनको हम नियन्त्रित नहीं कर सकते, तो हम 'शत्रुओं' के हाथोंमें खेलते हैं। आज हमारा उद्देश्य एक ऐसा वातावरण बनाना है जो शान्त और अहिंसापूर्ण होते हुए भी दृढ़ निश्चयसे प्रेरित हो । जब पूर्णतया अनु- शासित सैनिकोंकी ओरसे एकाएक गोलीबार शुरू हो जाता है, तो हमारा दृढ़ निश्चय काफूर हो जाता है । इसीलिए हमें गिरफ्तारियोंके विरुद्ध प्रदर्शनोंका आयोजन करना जान-बूझकर छोड़ देना चाहिए। सरकार जिनको भी गिरफ्तार करना चाहती है, उनको बिना किसी शोर-गुलके गिरफ्तार हो जाने देना चाहिए । जब हम अपने-आपपर पर्याप्त आत्म-नियन्त्रण प्राप्त कर लेंगे, तब हम स्वराज्य और सविनय अवज्ञाके लिए तैयार हो जायेंगे। यह आत्म-नियन्त्रण पूर्ण रूपसे स्वदेशीका पालन करनेसे ही पैदा होगा । विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार करने और अपनी जरूरतके लायक खादी तैयार करनेकी कोशिशसे हमारे अन्दर जितना आत्मविश्वास पैदा होगा, उतना अन्य किसी भी चीजसे पैदा नहीं हो सकता । रिहाईका दुःख श्री वेंकटप्पैयाने एक तार द्वारा खेद प्रकट किया है कि वे स्वयं रिहा कर दिये गये हैं और उनके दूसरे साथी अब भी हिरासत में हैं। मुझे भी इसका दुःख है । आज- कल तो जेल ही हर आत्म-सम्मानी भारतीयके लिए सबसे उपयुक्त स्थान है । आज अलीगढ़का हर आदमी मौलाना शेरवानी और उनके भाग्यसे ईर्षा करता है। बेगम ख्वाजाने मुझे लिखा है कि उनके शौहर के साथीके जेलमें रहते उन्हें अपने पतिकी Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४१
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