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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४३

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टिप्पणियाँ ५११ हम यही तो चाहते हैं कि स्थानीय लोकमतकी ताकतके बलपर ही अनियमितताओंको रोका और ठीक किया जा सके । प्रबुद्ध लोकमतके विरुद्ध क्या बंगाल और क्या मद्रास, कहींकी भी कांग्रेस कमेटी खड़ी नहीं रह सकती । यदि यह मान लिया जाये कि जनता वर्तमान चन्द नेताओंका अन्धानुसरण करती है तो फिर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीके फैसलेसे भी शिकायत करनेवालों को कोई सन्तोष नहीं हो सकता । कांग्रेसका अपना एक लोकतान्त्रिक संविधान है, लेकिन जबतक उसपर अमल करनेवाले कार्यकर्त्ता लोकतांत्रिकताको अपनाकर न चलें, और लोकमतको अपना पथ-प्रदर्शक मानकर चलनेके लिए तैयार न हों तबतक संविधानका इस्तेमाल निश्चय ही गैर-लोकतांत्रिक उद्देश्योंके लिए ही होगा । केन्द्रकी ओरसे जल्दबाजीमें अगर कोई हस्तक्षेप किया जायेगा तो उसका नतीजा यही होगा कि दलमें कटुता और फूट बढ़ेगी। इसीलिए कार्य-समिति जान-बूझकर इसके वैधानिक पक्षको बचाती रही। उसने गुण-दोषोंका विवेचन नहीं किया और दोनों पक्षोंसे अनुरोध किया कि वे स्थानीय तौरपर प्रयास करके सारा मामला निवटा लें । शास्त्रीय बहस या कानूनी बारीकियोंमें पड़नेका समय हमारे पास नहीं है । हमें पदोंकी बात कम और सेवाकी बात अधिक सोचनी चाहिए। एक अंग्रेज मित्रकी चेतावनी नीचे मैं एक अंग्रेज मित्रके पत्रके कुछ प्रासंगिक अंश उद्धत कर रहा हूँ। मैं इन अंग्रेज मित्रको कई वर्षसे जानता हूँ । वे बड़ी सत्यान्वेषी हैं । इनका कहना है : आपके कुछ वाक्य बड़े ही सुन्दर लगे, पर कुछ वाक्य ऐसे लगे जैसे आपके न हों, और इससे मुझे उलझन महसूस हुई। में आलोचना क्यों करूँ ? मुझे तो इस पेचीदा परिस्थितिकी जानकारी तक नहीं है। फिर में कैसे फतवा दे सकती हूँ कि आप जिस उग्र किस्मकी उथल-पुथलके लिए कोशिश कर रहे हैं उसका कोई औचित्य है या नहीं ? जब में पीछेकी ओर मुड़कर देखती हूँ कि मेरी आपपर कितनी श्रद्धा थी, आप मेरे तई किस तरह एक आदर्शके प्रतीक बन गये थे, तब यही इच्छा होती है कि परिस्थिति ज्योंकी-त्यों बनी रहती, उसमें कोई परिवर्तन न होता । और कुछ भी ऐसा घटित न होता कि मुझे यह सोचना पड़ता कि मैंने कहीं गलती तो नहीं की है। वैसे यह एक बड़ा कमजोर- सा खयाल है और वर्तमान परिस्थितिके कठोर यथार्थका सामना करनेका साहस मुझे अपने-आपमें बटोरने में सफल होना ही चाहिए। आप जिस हदतक सही रास्तेपर हैं, उस हदतक में अब भी आपके प्रति अपनी श्रद्धा बरकरार रख सकती हूँ। लेकिन में यहीं तो तय नहीं कर पाती कि आप किस हदतक सही रास्तेपर हैं। पर यह एक बात मुझे बिलकुल निश्चित लगती है, कि अगर आप गलतीपर होंगे तो आप अपनी सफलताको कामना भी नहीं करेंगे; क्योंकि सर्वोपरि सत्य आपको अपने प्रयासोंसे कहीं अधिक प्रिय है । कैसी विचित्र बात है कि हम लोग यह न जानते हुए भी कि सत्य क्या है, इसीके लिए सबसे अधिक चिन्तित रहते हैं कि सत्यकी ही विजय होनी चाहिए। हमारी अपनी योजनाओंके मुकाबले उसीको सफलता मिलनी चाहिए। Gandhi Heritage Portal