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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४७

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प्रिय बहनो, २५१. भारतीय महिलाओंसे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटीने विदेशी वस्त्रोंके पूर्ण बहिष्कार के लिए आगामी ३० सितम्बर अन्तिम तारीख निश्चित की है । यह बहिष्कार बम्बईमें ३१ जुलाईको लोकमान्य तिलककी स्मृतिमें प्रज्ज्वलित बलिदानकी अग्निसे प्रारम्भ किया गया था । जिन मूल्यवान साड़ियों तथा पोशाकोंको आप अबतक बढ़िया और सुन्दर समझती रही हैं, उनके विशाल ढेरमें आग लगानेका श्रेय मुझे दिया गया था । मेरा विचार कि जिन बहनोंने उसके लिए अपने कीमती कपड़े दे दिये थे उन्होंने ठीक और समझ- दारीका काम किया था। जिस प्रकार प्लेगके कीटाणुओंसे युक्त वस्तुओंको नष्ट कर देना ही उनका सर्वोत्तम उपयोग है उसी प्रकार विदेशी वस्त्रोंका सर्वोत्तम उपयोग उन्हें नष्ट कर देना ही है। राजनीतिके शरीरको और भी भयानक रोगोंसे बचानेके लिए की गई यह एक शल्यक्रिया है । भारतीय महिलाओंने पिछले बारह महीनोंमें मातृभूमिके लिए जबरदस्त काम किया है । आप लोग दयाके देवदूतोंकी तरह चुपचाप कार्य करती रहीं । आपने नकद राशि और कीमती आभूषण दिये । आप चन्दा एकत्र करनेके लिए घर-घर घूमीं । आपमें से कुछने तो धरना देनेमें भी सहायता की । आपमें से कुछ जो रंग-बिरंगी बढ़िया पोशाकें पहनती थीं और दिनमें कई बार अपनी पोशाकें बदलती थीं, अब सफेद और निष्कलंक किन्तु मोटी खादीकी साड़ियाँ पहनने लगी हैं । ये साड़ियाँ स्त्रीकी सहज पवित्रताकी याद दिलाती हैं । आपने यह सब भारतके लिए, खिलाफतके लिए और पंजाब के लिए किया है । आपकी वाणी और कार्य में किसी प्रकारका छल नहीं है । आपका बलिदान सर्वथा शुद्ध है; उसमें क्रोध या घृणाका लेश भी नहीं है । मैं आपके सामने यह स्वीकार करना चाहता हूँ कि भारत-भरमें आपने स्वतः प्रेरित होकर प्रेम- पूर्वक आन्दोलनके प्रति जो अनुकूल प्रतिक्रिया दिखाई उससे मुझे विश्वास हो गया है कि ईश्वर हमारे साथ है । हमारा संघर्ष आत्मशुद्धिका संघर्ष है, यह इसी बातसे प्रमाणित हो जाता है कि भारतकी लाखों महिलाएँ सक्रिय रूपसे इसकी सहायता कर रही हैं । आपने काफी दिया है, किन्तु अभी और भी देना आवश्यक है। तिलक स्वराज्य- कोषमें पुरुषोंने अधिक चन्दा दिया है। किन्तु स्वदेशीका कार्यक्रम तभी पूरा हो सकता है जब कि आप उसमें प्रमुख रूपसे भाग लें। " जबतक आप अपने सारे विदेशी कपड़े नहीं दे डालतीं" तबतक बहिष्कार असम्भव है । जबतक उनमें आपकी रुचि रहेगी तबतक उन्हें आप छोड़ नहीं सकेंगी, उनका बहिष्कार नहीं कर सकेंगी। बहिष्कारका अर्थ है सम्पूर्ण परित्याग । भगवान् जो बच्चे हमें देता है हम उन्हें पाकर खुश रहते हैं और उसे भगवान्‌की कृपा मानते हैं, उसी प्रकार जो कपड़ा देशमें ही बन सकता है उससे हमें सन्तुष्ट रहना सीख लेना चाहिए। मैं तो ऐसी किसी माँको नहीं जानता जिसने किसी बाहरी व्यक्तिके कुरूप कहनेपर अपने बच्चेको फेंक दिया हो। भारतमें Gandhi Heritage Portal