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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५४८

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५१६ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय निर्मित वस्तुओंके प्रति देशभक्त महिलाओंका भाव ऐसा ही होना चाहिए। आपके लिए तो भारतीय वस्त्रका मतलब हाथ-कता और हाथ-बुना वस्त्र ही हो सकता है, और इस संक्रान्ति-कालमें बहुतायतसे केवल मोटी खादी ही मिल सकती है । आप अपनी रुचिके अनुरूप आवश्यक कला-कौशलका प्रयोग करके उसे जितना बने सुन्दर बना लें। यदि आप कुछ महीनोंतक मोटी खादीसे ही सन्तुष्ट हो जायें तो हम आशा कर सकते हैं कि आगे चलकर फिर देशमें पुराने जमानेकी तरह वैसा महीन, मूल्यवान् और सुन्दर कपड़ा बनने लगेगा, जिसे एक समय संसार ईर्ष्यासे देखता रह जाता था । मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि छः महीने भी यदि आपने इतना आत्म- त्याग किया तो यह बात आपकी समझ में आ जायेगी कि जिसे आज हम कला कहते हैं वह बनावटी कला है; सच्ची कला केवल बाहरी आकारको नहीं देखती बल्कि जो कुछ उसके पीछे है उसे भी देखती है। एक कला वह है जो नाश करती है और दूसरी वह है जो जीवन देती है । जो महीन कपड़ा हम पश्चिम या सुदूर पूर्वसे मँगाते हैं, वास्तवमें उसने हमारे लाखों भाई-बहनोंको खत्म कर दिया और हमारी हजारों बहनोंको शर्मनाक जिन्दगी बितानेके लिए मजबूर किया है। सच्ची कला कलाकारकी प्रसन्नता, परितृप्ति तथा पवित्रताकी द्योतक होती है और यदि आप हमारे बीच इस प्रकारकी कलाको पुनरुज्जीवित करना चाहती हैं तो आपमें जो श्रेष्ठ हैं उनके लिए फिलहाल खादीका उपयोग करना कर्त्तव्यरूप है । स्वदेशीके कार्यक्रमकी सफलता के लिए न केवल खादीका उपयोग वरन् यह भी आवश्यक है कि आपमें से प्रत्येक अपनी फुरसतके समय चरखा काते। मैंने बालकों और पुरुषोंके लिए भी यही सुझाव दिया है । आज उनमें से हजारों रोजाना चरखा कात भी रहे हैं । किन्तु जैसा पहले होता था चरखा कातनेका काम प्रमुख रूपसे आप लोगोंको उठाना चाहिए। दो सौ वर्ष पूर्व भारतकी महिलाएँ न केवल घरकी बल्कि विदेशोंकी माँगको पूरा करनेके लिए भी कातती थीं। वे केवल मोटा सूत ही नहीं, दुनियामें किसी भी समय जो महीनसे-महीन सूत काता गया है वैसा महीन सूत भी कातती थीं। हमारे पूर्वज जितना महीन सूत कातते थे उतना महीन सूत आजतक कोई मशीन भी नहीं कात सकी। इसलिए यदि हमें इन दो महीनों में और उसके बाद खादीकी माँग पूरी करनी है तो आपको कताई - मण्डल बनाकर तथा कताईकी प्रतियोगिताएँ चलाकर भारतीय बाजारको हाथकते सूतसे पाट देना चाहिए। इस उद्देश्यके लिए आपमें से कुछको कातने, धुनने तथा चरखोंको दुरुस्त करनेमें सिद्धहस्त होना चाहिए। इसका अर्थ है निरन्तर परिश्रम करते रहना । आप सूत कातनेको आजीविकाका साधन न समझेंगी । मध्य-वर्गके परिवारकी आय उससे बढ़ेगी। अलबत्ता बहुत ही गरीब स्त्रियोंके लिए यह आजीविकाका साधन है । चरखेको पहलेकी तरह विधवाओंका सहारा बनना है । किन्तु जो इस अपीलको पढ़ेंगी उनके सामने तो मैं चरखा यही कहकर पेश करना चाहता हूँ कि उसे चलाना आपका कर्त्तव्य और धर्म है । यदि भारतकी सभी सम्पन्न महिलाएँ प्रतिदिन एक निश्चित मात्रामें सूत कातने लगें तो उससे सूत सस्ता हो जायेगा और उसमें इतनी जल्दी आवश्यक सुन्दरता ले आयेंगी जितनी जल्दी कि अन्य उपायोंसे सम्भव नहीं । Gandhi Heritage Portal