सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५५१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

प्रिय चार्ली, २५३. पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको बिहार शरीफ १३ अगस्त [ १९२१ ] मुझे तुम्हारे दो पत्र मिले हैं। मैं जानता हूँ, सारे आन्दोलनकी योजना गरीबोंके प्रति सेवा-भावनाको लेकर बनाई गई है, इसलिए मेरा विदेशी वस्त्रोंकी होली जलाना गलत हो ही नहीं सकता। चूँकि विदेशी वस्त्रोंका अब हमारे लिए कोई उपयोग नहीं रहा है, इसलिए उन्हें गरीबोंमें बाँट देना मुझे नितान्त अपमानजनक लगता है । यह तो वही वस्त्र है, जिसने देशमें गरीबी फैलाई और हजारों स्त्रियोंको शर्मनाक जिंदगी बितानेपर मजबूर किया। हजारों सड़ी-गली टोपियोंकी बात तो दूर रही, यदि रेशमी रूमालों, महीन साड़ियों और उनसे भी महीन कमीजोंको गरीबोंमें बाँट दिया जाये तो स्वयं गरीब ही यह नहीं समझ सकेंगे कि अचानक उनपर यह दया क्यों हो रही है। विदेशी वस्त्रोंको जलानेका प्रमुख उद्देश्य यह है कि हमने विचारपूर्वक गरीबोंको हानि पहुँचाकर अपनेको जो विदेशी वस्त्रोंसे सुसज्जित किया है, उनके प्रति हमारे हृदयमें अत्यन्त घृणा उत्पन्न हो । हाँ, मुझे उन विदेशी वस्त्रोंको पहनना पाप समझने में कोई बुराई नजर नहीं आती जिनका उद्देश्य भारतका अपमान करना और उसे गुलाम बनाना है । मैं इस समय इस प्रयत्नमें हूँ कि शल्यक्रिया हाथको दृढ़ रखकर की जाये जिससे वह सुचारु रूपसे हो सके। मैं उस वस्त्रका आदर करूँगा जिसे किसी यूरोपीय बहनने प्रेमके साथ तैयार किया हो, किन्तु फिर भी मैं उस निषिद्ध वस्त्रका उपयोग करनेको राजी नहीं हो सकता क्योंकि किसी व्यक्तिको माँके हाथसे भी ऐसा अपाच्य भोजन स्वीकार करनेके लिए तैयार नहीं होना चाहिए जिसे वह प्रेमके कारण अज्ञानवश दे रही हो । श्रीमती रॉबर्टसने मेरे लिए एक ऐसी चीज भेजी थी जिसमें उनकी दृष्टिसे, दूधके सब गुण मौजूद थे किन्तु जो गायके दूधसे नहीं बनाई गई थी । किन्तु जब मुझे मालूम हुआ कि वह दूधसे बनाई गई है तब मैंने तुरन्त उन्हें यह बात बताई और उसका उपयोग न करनेकी छूट माँगी। उन्होंने न केवल मेरे दृष्टि- कोणको समझा बल्कि गलतीके लिए क्षमा-याचना भी की। तथ्य यह है कि मैं जीवनमें अनुशासन और संयम चाहता हूँ । तथाकथित योगियों द्वारा अपने शरीरको दी जानेवाली यातनामें अक्सर उक्त गुण विकृतिके रूपमें दिखाई देते हैं । किन्तु उनके मूलतत्त्व अत्यधिक जाँच-पड़तालमें भी खरे उतरेंगे। तुम इसका ठीक अनुमान नहीं लगा सकते कि वे लोग जो पापीसे घृणा करते थे किस प्रकार चुपचाप अनजाने ही पापीके बजाय पापसे घृणा करने लगे हैं। पहली अगस्तको बम्बईकी अंग्रेज महिलाओंको [ भारतीयोंसे सावधान रहनेको] चेताया गया था ! किन्तु उस दिन स्टोक्स और एक १. गांधीजी १९२१ में इन्हीं दिनों बिहार शरीफमें थे । Gandhi Heritage Portal