टिप्पणियाँ ५३३ | स्थानपर तो उनकी मेहनतसे कांग्रेसका कार्य अच्छी तरह जमा हुआ दिखाई देता कांग्रेसके कार्य में भाग लेते हुए भी वे स्वयं निरभिमानी हैं। इस तरह गुजरातसे बाहर गुजराती अपने गुणोंको प्रगट कर रहे हैं, यह देखकर मुझे बहुत सन्तोष होता है । अगर हम हर तरहके भयसे मुक्त हो जायें तो अभी और भी ज्यादा देशसेवा कर सकते हैं। शान्तिका बल । प्रत्येक स्थानपर मैं यह देखता हूँ कि जहाँ लोग शान्तिके पाठको अच्छी तरह समझ गये हैं वहाँ उन्होंने ज्यादासे-ज्यादा तरक्की की है । भय अथवा दुर्बलताके मारे जिस शान्तिका पालन किया जाता है वह सच्ची शान्ति नहीं है। सच्ची शान्ति वही हो सकती है जिसमें बल और तेज हो । अंग्रेजोंके प्रति अपने सम्बन्धों में जैसे हमने शान्ति नहीं खोई उसी तरह हमें अपने ही अधिकारियों, सिपाहियों और पुलिस आदिके प्रति भी नहीं खोनी है। एक भाई मुझसे पूछते हैं कि हमें परस्पर शान्ति बनाये रखनी चाहिए अथवा सिर्फ अंग्रेजोंके प्रति। इस प्रश्नके लिए तो कोई गुंजाइश ही नहीं हो सकती । हम अपने लोगोंके प्रति शान्तिका पालन नहीं करेंगे तो भी हार जायेंगे । असहयोगी सबके प्रति विनयी रहता है, सबके प्रति शान्त और नम्र रहता है। व्यक्ति जितना शूरवीर हो उसे उतना ही शान्त होना चाहिए; वह जितना बड़ा हो उसे उतना ही नम्र होना चाहिए। उद्धत व्यक्ति, जो बात-बात में मारने और गाली देनेके लिए तैयार रहता है, अपना बल खो बैठता है । शान्ति भी सूक्ष्म वीर्य है; उसको संचित करनेवाला भी प्रौढ़ ब्रह्मचारी और तेजस्वी बनता है । हमने ब्रह्मचर्यकी व्याख्याको स्थूल स्वरूप प्रदान करके जो व्यक्ति प्रतिक्षण क्रोधसे भड़क उठते हैं उन्हें दोषी मानना छोड़ दिया है । शरीर सुखके लिए जिस तरह स्थूल ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है उसी तरह आध्यात्मिक ब्रह्मचर्यकी भी आवश्यकता है । मेरा तो विश्वास है कि हमने सहयोगियोंपर क्रोध करके, पुलिसको गाली देकर अपनी लड़ाईको लम्बा कर दिया है । यदि हम मन, वचन और कर्मसे सब विरोधियोंके प्रति शान्त, विनम्र और विनयी रहे होते तो अभीतक समस्त सत्ताको अपने हाथमें लेकर बैठ गये होते । पारसी बहनोंसे मैं जानता हूँ कि एक अच्छी संख्यामें पारसी बहनें 'नवजीवन' पढ़ती हैं। उन्हें 'नवजीवन' की भाषाको समझने में जरा कठिनाई होती होगी। मैं जहाँतक बने सरल भाषा लिखने और संयुक्ताक्षरोंको न आने देनेका प्रयत्न करता हूँ, लेकिन भाषाके नियमोंकी एकदम उपेक्षा नहीं की जा सकती। पारसियोंने गुजरातीको इतना ज्यादा बिगाड़ दिया है कि उनके साथ प्रतिस्पर्धा करना भाषाका खून करनेके समान होगा । इसलिए बहनोंसे मेरी प्रार्थना है कि उन्हें जो शब्द कठिन लगे उन्हें जाननेके लिए मेहनत करें, किसीसे पूछ लें। थोड़ेसे अंकोंको इस तरह प्रयत्नपूर्वक पढ़नेके बाद उन्हें फिर बिलकुल अड़चन नहीं होगी । पारसी भाइयों और बहनोंको यही शोभा देता है कि वे भाषाको सुधारनेका प्रयत्न करें। अब तो पारसी गुजराती, मुसलमान गुजराती और हिन्दू गुजराती Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५६५
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