परिशिष्ट २ चरखा और अकाल-पीड़ितोंकी सहायता अगस्त १९२० में जब अकाल तीव्र रूपमें था, उस समय ऐसा सोचा गया कि दुर्भिक्ष पीड़ितों की सहायता के लिए सम्भ्रान्त मध्यम वर्ग के लोगोंको चरखा चलाना चाहिए। इसकी शुरुआत के लिए कुमारी लेथमने कृपापूर्वक एक चरखा प्रदान किया । कोशिश इस बातकी की गई कि यह काम विशेषतया धाँगरों द्वारा, जो ऊन कातने के अभ्यस्त थे, कराया जाये परन्तु वह प्रयत्न असफल रहा । रुईकी कताईसे जो बिलकुल अनभिज्ञ हो ग्रामके ऐसे लोगोंसे बारीक सूत कतवाना असम्भव था । इसके सम्बन्धमें शंका उठाई गई कि आया इस कामसे -- अगर यह शुरू किया गया पैसे कमाये जा सकते हैं या नहीं अथवा थोड़ी-बहुत मदद मिल सकती है या नहीं । इस प्रकारकी भिन्न-भिन्न कठिनाइयों और आपत्तियोंके बीच लगभग तीन मासतक चरखा बिना चले ही पड़ा रहा और बड़ी कोशिशोंके बावजूद चरखा चलानेके लिए कोई भी व्यक्ति राजी न दीख पड़ा। दिसम्बर १९२० में कुमारी लेथमने श्रीमती जे० पेटिटकी मेहरबानी- के परिणामस्वरूप चार चरखे पुनः भेजे। थोड़ी रुई भी भेजी। ये दोनों चीजें कुछ व्यक्तियोंमें आजमाइश के तौरपर वितरित की गईं। अब कुछ आशा जागी । अन्ततोगत्वा एक रमोशी स्त्री यह काम लगनके साथ करने पर राजी कर ली गई । यह बात २० जनवरी, १९२१ के लगभग की है । उस दिनसे कताईके काममें कुछ और ही छटा दीख पड़ने लगी । इस स्त्रीका अनुकरण दो अन्य स्त्रियोंने किया, वे चरखा चलानेको राजी हो गईं। बड़े अध्यवसायके फलस्वरूप इन तीन महिलाओं द्वारा ४ पौंड सूत तैयार किया गया और उसे बिक्रीके वास्ते भेजा गया । इस बीच अनेक स्त्रियोंने पूछताछ शुरू की और यह इच्छा व्यक्त की कि अगर इस कामसे उन्हें थोड़ा- बहुत भी आर्थिक लाभ हो तो वे कताई करना चाहेंगी। इसलिए कताईकी दर ६ आना पौंड निर्धारित की गई। इससे अन्य कतैये भी इस काममें शामिल होने लगे । अब दूसरी कठिनाई धनकी आ खड़ी हुई । पाँचों चरखे चलाये जा रहे थे । उसी गाँवमें जो पाँच चरखे बनवाये गये थे, वे भी चालू हो गये थे । उस केन्द्र में रुईका जो भण्डार था वह चुक गया था । ऐसा लगने लगा था कि चरखे बनवाने, रुई खरीदने और मजदूरी देनेके लिए आवश्यक धनके अभाव में काम रुका रहेगा। राव बहादुर चितलेने यह कठिनाई स्वयं आकर देखी-समझी और १००) प्रदान करके काममें सहायता की। कुमारी लेथमको जब इस कठिनाईका पता चला तो उन्होंने भी एक सौ रुपये भेजे । ये दोनों दान ऐन मौकेपर प्राप्त हुए और उनकी बदौलत काम चल निकला । स्थानीय लोगोंने अपने पाससे कपास देकर इस काममें सहायता दी । चरखोंकी माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई । वहाँके लोग इतने गरीब थे कि अपना- अपना चरखा भी नहीं खरीद सकते थे । इसलिए यह आवश्यक हो गया कि उसी गाँवमें Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५८७
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