परिशिष्ट (२) ५६३ ५ मार्च, १९२१ असहयोगकी कल्पना राजनैतिक कार्योंके लिए अपनाई हुई फकीरी है । हमारे विद्यार्थी अपने त्यागकी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं । उनका यह त्याग उन्हें कहाँ ले जा रहा है ? पूर्णतर शिक्षाकी ओर नहीं, बल्कि अशिक्षाकी ओर । उस कल्पनाके पीछे विनाशका उत्कट सुख है और यह भावना अपने सबसे सुन्दर रूपमें फकीरी या संन्यास, तथा खराबसे- खराब रूपमें भयंकरताका वह ताण्डव है जिसके चलते मानव- प्रकृति सामान्य जीवनकी मौलिक वास्तविकतामें विश्वास खो बैठती है और निरर्थक विनाशमें उदासीनतापूर्ण आनन्दका अनुभव करती है - जैसा कि गत महायुद्धके अवसर- पर तथा हमारे ही जीवनमें घटित होनेवाले ऐसे ही अन्य अवसरोंपर प्रकट हो चुका है । यह भावना अपने अनाक्रामक नैतिक रूपमें संन्यास है, और सक्रिय नैतिक रूपमें हिंसा । मरुस्थल (उपेक्षा) भी उसी प्रकार हिंसाका रूप है जैसा कि तूफानके समय विक्षुब्ध सागर । ये दोनों ही जीवनके शत्रु हैं । बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन के जमानेका वह दिन मुझे याद है जब तरुण विद्यार्थियों- का एक समूह मुझसे मिलने आया । मैं उस समय अपने 'विचित्रा' निवासकी पहली मंजिल के बड़े कमरे में था । उन्होंने मुझसे कहा कि यदि आप हमें अपने स्कूल और कालेज छोड़ देनेका आदेश देंगे तो हम लोग तुरन्त ही उसका पालन करेंगे । मैंने ऐसा करनेसे दृढ़तापूर्वक इनकार कर दिया । वे क्रोधित हुए और इस भावके साथ लौट गये कि कदाचित् मुझमें देश-प्रेम है ही नहीं । परन्तु जनताके इस अदम्य उत्साह- के प्रदर्शनसे बहुत पहले मैंने, उस समय जब मेरे पास अपना कहनेको ५ रुपये तक न थे, एक स्वदेशी स्टोर खोलने के निमित्त एक हजार रुपये दिये थे और इस प्रकार मैं पैसे-पैसेको मुहताज हो गया था । उन विद्यार्थियोंको पढ़ाई छोड़नेकी सलाह देनेसे इनकार करनेका कारण यह था कि स्कूल छोड़ना एक नकारात्मक कदम है जिससे अराजकता फैलती है; और यह कदम अस्थायी रूपसे ही क्यों न उठाया गया हो, मुझे कभी पसन्द नहीं है । मुझे एक ऐसे काल्पनिक सिद्धान्तसे भय लगता है जो वास्तविकताकी ओरसे आँखें मूंदनेको तैयार है । आप जानते हैं कि मैं पाश्चात्य देशोंकी अर्थ-प्रधान सभ्यतामें उसी प्रकार विश्वास नहीं करता जिस प्रकार में मानवमें उसके शरीरको ही सबसे बड़ा सत्य मानने से इनकार करता हूँ । शरीरको नष्ट करने तथा जीवनकी भौतिक आवश्यकताओंकी उपेक्षा करनेमें तो मेरा और भी कम विश्वास है । जरूरत इस बातकी है कि मनुष्यकी शारीरिक और आध्यात्मिक प्रकृतिके बीच सामंजस्य स्थापित किया जाये, बुनियाद और उसपर खड़े भवनके बीच सन्तुलन बनाये रखा जाये। मैं पूर्व और पश्चिमके वास्तविक मिलनमें विश्वास करता हूँ । प्रेम आत्मा- का अन्तिम सत्य है । हमें उस सत्यपर आघात करनेका नहीं, वरन् सब प्रकारके विरोधोंके बीच भी उस सत्यकी ध्वजाको ऊँचा रखनेका भरसक प्रयत्न करना चाहिए । असहयोगका विचार उस सत्यको अनावश्यक रूपसे चोट पहुँचाता है । वह हमारे चूल्हों में जलनेवाली अग्नि नहीं है बल्कि वह आग है जो हमारे घरोंको भस्मीभूत कर देती है । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 20.pdf/५९५
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