कलकत्ताके कड़वे अनुभव १४३ मद्रास यू० पी० कस्तूरी जवाहरलाल आन्ध्र वेंकटापय्या महाराष्ट्र केलकर कर्नाटक गंगाधरराव गुजरात वल्लभभाई गुजरात विट्ठलभाई बिहार राजेन्द्र हसरत टी० प्रकाशम् यू० पी आन्ध्र अंग्रेजी प्रति (एस० एन० ७६२८) की फोटो - नकलसे । ५९. कलकत्ताके कड़वे अनुभव -- पूर्व बंगालकी यात्राका कुछ हाल में पहले ही लिख चुका हूँ। वहाँ यद्यपि हजारों आदमियोंकी भीड़ होती थी तो भी उससे मैं परेशान नहीं होता था । लेकिन कलकत्ते में तो में बिलकुल थक गया हूँ। एक तो आधी-आधी राततक सोनेको नहीं मिलता और दूसरे यह जयघोष जो होता ही रहता है ! ये बातें अब मुझे नागवार मालूम होती हैं। दिन-भर 'जयघोष' को सुनते-सुनते मैं थक जाता हूँ । कान उसे गवारा नहीं कर सकते । फिर, इसमें कुछ मतलब भी नजर नहीं आता। इससे मुझे यह दुस्सह मालूम होता है । इस तरहकी आवाजोंसे लोगोंको कोई फायदा नहीं पहुँचता, यह बात मैं अच्छी तरह जानता हूँ । जब लोगोंको ज्ञान नहीं था, जब वे बोलते हुए भी डरते थे, तब तो जरूर इस जय-जयकारसे उनके दिलोंमें जोश उमड़ता होगा । इस बातका अनुभव मुझे चम्पारनमें मिला था । वहाँ सैकड़ों आदमी सिर्फ इसीलिए मुझे घेरकर बैठ जाते थे कि उन्हें स्फूर्ति मिले। इस कारण, यद्यपि उनका प्रेम मुझे हैरान तो कर देता था, लेकिन फिर भी मैं उसे सह लेता था । यहाँ भी प्रेम तो वैसा ही है । पर इस जय-जयकारसे तो अन्ध मोह प्रकट होता है। इसमें न लोगोंका फायदा है और न मेरा । यह तो मैंने अपने स्वार्थकी दृष्टिसे जयघोषपर विचार किया। लेकिन चरणस्पर्श भी उतना ही दुःखदायी है। कितनी ही बार मुझे चोट लग जाती है, और कभी-कभी तो मैं गिरते-गिरते बचता हूँ । सभाओंमें जाते हुए मेरा कलेजा काँपता है । लेकिन जयघोषमें तो मुझे खतरा भी नजर आता है। क्योंकि जब लोग प्रेमो- न्मत्त होकर बराबर चिल्लाते रहते हैं तब वे अपने कानसे किसी दूसरी बातको सुन नहीं सकते, और न आँखोंसे कुछ देख ही सकते हैं । अब मान लीजिए कि ऐसे मौकेपर किसीने दंगा-फसाद खड़ा कर दिया और दो तीन लाठियाँ भी चल पड़ीं। मैं खड़ा हुआ यह Gandhi Heritage Portal
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