महान् प्रहरी ३०५ पिछली रात नये रक्तका संचार होता रहा था । लेकिन मैंने तो शोक-विह्वल मनसे ऐसे पंछी भी देखे हैं जो शक्तिके अभाव में लाख प्रोत्साहन और हिम्मत देनेपर भी अपने डैने फड़फड़ा तक नहीं पाये । भारतीय आकाशके तले रहनेवाले मानव-पंछीको रात में नींद नहीं आती, वह सोनेका महज बहाना करता है और प्रातःकाल जब वह उठता है, तब वह पिछले दिनसे भी ज्यादा कमजोर उठता है। यहाँ करोड़ों लोगोंका जीवन सतत जागरण और चिन्ताका या सतत संज्ञा-शून्यताका जीवन है । यह एक ऐसी दुःखद स्थिति है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, और उसका एहसास किसीको तभी हो सकता है जब कोई स्वयं उस स्थितिको भोगकर देखे । मैंने तो किसी रुग्ण व्यक्तिकी पीड़ाको कबीरका कोई भजन सुनाकर दूर कर पाना असम्भव ही पाया है । करोड़ों भूखे लोग आज एक ही कविताकी माँग कर रहे हैं -- भूख मिटानेवाली भोजनरूपी कविताकी । लेकिन वह उन्हें कोई नहीं दे पा रहा है। उन्हें अपना भोजन स्वयं प्राप्त करना है; और वे प्राप्त कर सकते हैं सिर्फ अपने भालसे पसीना बहाकर । इन श्लोकोंमें मेरे लेखे चरखेका समस्त साहित्य निहित है- है - उस चरखेका, जिसे चलाना मैं आजके भारतके लिए एक अनिवार्य यज्ञ मानता हूँ। अगर हम अपना वर्तमान ठीक कर लेते हैं, तो हमारे भविष्यकी चिन्ता भगवान करेगा ही । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १३-१०-१९२१ १. इसके बाद भगवद्गीताके तीसरे अध्यायके निम्नलिखित ८-१६ श्लोक दिये गये हैं : २१-२० नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥ ८ ॥ यज्ञार्थीत्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥ ९ ॥ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥ देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ इष्टान् भोगान्दि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥ १२ ॥ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । भुञ्जते ते त्वधं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥ अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यशः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थं स जीवति ॥ १६ ॥ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/३३७
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