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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/३५३

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भाई श्री ५ महादेव, १३५. पत्र : महादेव देसाईको आश्रम बुधवार [१९ अक्तूबर, १९२१ को या उसके पश्चात् ] तुम्हारा भेजा हुआ चेक तो मुझे रखना ही पड़ेगा । बादमें, जब तुम्हें जरूरत होगी तब तुम्हें पैसा मुझसे माँगना पड़ेगा। ऐसा लगता है कि मोतीलालजीको परिवारके लोगोंकी इन बीमारियोंसे छुटकारा कभी मिलेगा ही नहीं । स्वदेशीके विषयमें लोगोंको अपनी बात मैं जँचा नहीं पाता, इससे क्या मेरी तपस्याकी कमी नहीं सूचित होती ? एक पूर्ण तपस्वी बोले बिना भी लोगोंको अपनी भावनाओंसे प्रभावित करता है । कुछ लोग संकेतमात्रसे, तो कुछ बोलकर और कुछ लिखकर ही अपनी बात समझा पाते हैं ? इस सबका क्या रहस्य है ? जो लोग खादी केवल मेरी हाजिरीमें पहनते हैं वे मेरी तपस्याके कारण नहीं, मेरे प्रति अपने प्रेमके कारण ही ऐसा करते हैं। भविष्यमें स्वतन्त्र हिन्दुस्तान अपना अनाज क्या विदेशोंसे मँगायेगा ? यदि नहीं, तो कपड़ा भी नहीं मँगायेगा। क्या हम पानी और दवा भी विदेशसे मंगायेंगे ? अलबत्ता, जब हमारे देशमें कपास पैदा होना बन्द हो जायेगा तब जरूर हमारा धर्म बदल जायेगा । लेकिन तब तो हमें यह देश ही छोड़ देना पड़ेगा । यह तो तुमने सुन ही लिया होगा कि किशोरलालने एकान्तमें एक झोंपड़ी बनवाई है और आजकल उसीमें रह रहे हैं । गुजराती पत्र (एस० एन० १०६०१) की फोटो - नकलसे । १३६. टिप्पणियाँ गीता में चरखा कविवर [ रवीन्द्रनाथ ठाकुर ] ने 'मॉडर्न रिव्यू' में इस बात के खिलाफ अनेक आपत्तियाँ उठाई थीं कि एक पुनीत कार्य मानकर सभीको चरखा चलाना चाहिए । पिछले अंकमें मैंने उनकी इन आपत्तियोंका उत्तर देनेकी कोशिश की है । मैंने पूरे विनीत भावसे और इस इच्छाके वश ऐसा किया है कि कविवरको तथा उनके सदृश मत रखनेवाले अन्य लोगोंको अपने मतसे सहमत कर सकूँ । पाठकोंके लिए यह जानना रोचक होगा कि मेरी यह मान्यता बहुत अंशोंमें 'भगवद्गीता' पर आधारित है। १. अन्तिम अनुच्छेद में किशोरलाल मशरूवालाके एकान्तमें एक झोंपड़ी में जाकर रहनेका उल्लेख है। श्री मशरूवाला इस झोंपडीमें शुक्रवार, १४ अक्तूबर, १९२१ को रहनेके लिए गये थे । २. देखिए " महान् प्रहरी ", १३-१०-१९२१ । २१-२१ Gandhi Heritage Portal