जब आप मर मिटने को तैयार रहेंगे तभी आप अली-बंधुओं और गंगाधर राव देशपांडे को मुक्त करा सकेंगे। मैंने गंगाधर राव देशपांडे को एक पत्र लिखा है; जिसमें कहा है कि पता नहीं, आपने किस बात से प्रेरित होकर ऐसा किया। मैंने यह भी लिख दिया है कि ३१ दिसम्बर से पहले आप जितना आराम कर सकें, कर लें, क्योंकि उसके बाद जब आप जेल से बाहर आयेंगे तो आपको देश के लिए काम करना होगा। अपने भाइयों को जेल से छुड़ाने के लिए भारतीयों को या तो स्वराज्य प्राप्त करना चाहिए, अथवा जेल जाना चाहिए, या अपने देश की सेवा करते हुए मिट जाना चाहिए। मैं आपसे यही कहने के लिए इस सभा में आया हूँ। बम्बई के लोग सुन्दर महीन कपड़ों और विलासिता की अन्य चीजों के बड़े शौकीन हैं, लेकिन जिस क्षण आप सब स्वराज्य के लिए काम करने और मर मिटने के लिए कटिबद्ध हो जायेंगे, उसी क्षण आपको स्वराज्य मिल जायगा। मुझे बम्बई के लोगों से अब भी बड़ी-बड़ी आशाएँ हैं। समय कम है, इसलिए आपको तत्पर रहकर अपना काम करना है। मैं निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि ३१ दिसम्बर से पहले क्या होगा। मैं ईश्वर से बराबर यही प्रार्थना करता रहता हूँ कि उस दिन तक या तो मुझे जेल भेज दिया जाये या गोली से उड़ा दिया जाये, और नहीं तो भारत स्वतंत्र हो जाये। इस देश में स्वराज्य के बारे में मेरी जो कल्पना है वह अराजकता की कल्पना नहीं है। मैं चाहता हूँ, लोग ईश्वर से डरें, गुणवान बनें तथा सत्यपरायण, धर्मनिष्ठ और बहादुर बनें। मैं नहीं जानता, आगे मेरे साथ क्या कुछ होने वाला है, और हो सकता है मेरे ये शब्द आखिरी शब्द साबित हों। इसलिए आपसे मेरा निवेदन है कि आप देश के प्रति अपना कर्तव्य निर्भीकता से निभायें। हम किसी को मारने के लिए तैयार नहीं हैं; लेकिन मरने को तो तैयार हैं। अपने रवैये से आपको सरकार को इस बात की प्रतीति करा देनी है कि इसके लिए आपको मारना या आपका दमन करना पाप है और यह ऐसा काम है जो नहीं किया जा सकता। जब तक आप दूसरों का विश्वास नहीं करते, दूसरे आपका विश्वास नहीं करेंगे। तो मेरा अनुरोध है कि आप दूसरों का विश्वास करें। ऐसा करके आप अपने शासकों के मित्र बन जायेंगे। लेकिन चाहे आप उनके मित्र बनें या न बनें, हम भारतीयों को अपने मन में अपने शासकों के प्रति किसी प्रकार का घृणा का भाव नहीं रखना है। आपको दूसरे पक्ष के प्रति किसी तरह का घृणा का भाव रखे बिना स्वराज्य के लिए लड़ना चाहिए। अगर मैं भारतीयों को इतनी सी बात समझा सकूँ तो उन्हें स्वराज्य मिल कर रहेगा। मैं आपके भीतर वह विश्वास जगाना चाहता हूँ कि मरने में मारने से ज्यादा बहादुरी है। मेरा यह भी अनुरोध है कि जब तक युवराज आपके बीच रहें, आप उनका बाल भी बाँका न करें, और न सरकारी अधिकारियों का ही कोई नुकसान करें। अगर सरकार खुद भारतीयों को मारना चाहे तो उसे मारने दीजिए, क्योंकि हम
१. देखिए "पत्र: गंगाधर राव देशपांडे को", ८-१०-१९२१ के पूर्व।