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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५१६

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४८४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय जब आप मर मिटने को तैयार रहेंगे तभी आप अली-बन्धुओं और गंगाधर राव देशपाण्डे- को मुक्त करा सकेंगे। मैंने गंगाधर राव देशपाण्डेको एक पत्र लिखा है; जिसमें कहा है कि पता नहीं, आपने किस बात से प्रेरित होकर ऐसा किया। मैंने यह भी लिख दिया है कि ३१ दिसम्बरसे पहले आप जितना आराम कर सकें, कर लें, क्योंकि उसके बाद जब आप जेलसे बाहर आयेंगे तो आपको देशके लिए काम करना होगा। अपने भाइयोंको जेल से छुड़ाने के लिए भारतीयोंको या तो स्वराज्य प्राप्त करना चाहिए, अथवा जेल जाना चाहिए, या अपने देशकी सेवा करते हुए मिट जाना चाहिए। मैं आपसे यही कहनेके लिए इस सभामें आया हूँ । बम्बईके लोग सुन्दर महीन कपड़ों और विला- सिताकी अन्य चीजोंके बड़े शौकीन हैं, लेकिन जिस क्षण आप सब स्वराज्यके लिए काम करने और मर मिटनेके लिए कटिबद्ध हो जायेंगे, उसी क्षण आपको स्वराज्य मिल जायगा । मुझे बम्बईके लोगोंसे अब भी बड़ी-बड़ी आशाएँ हैं । समय कम है, इसलिए आपको तत्पर रहकर अपना काम करना है । में निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि ३१ दिसम्बरसे पहले क्या होगा । मैं ईश्वरसे बराबर यही प्रार्थना करता रहता हूँ कि उस दिनतक या तो मुझे जेल भेज दिया जाये या गोलीसे उड़ा दिया जाये, और नहीं तो भारत स्वतंत्र हो जाये । इस देशमें स्वराज्यके बारेमें मेरी जो कल्पना है वह अराजकताकी कल्पना नहीं है। मैं चाहता हूँ, लोग ईश्वरसे डरें, गुणवान् बनें तथा सत्यपरायण, धर्मनिष्ठ और बहादुर बनें। मैं नहीं जानता, आगे मेरे साथ क्या कुछ होनेवाला है, और हो सकता है मेरे ये शब्द आखिरी शब्द साबित हों। इसलिए आपसे मेरा निवेदन है कि आप देशके प्रति अपना कर्त्तव्य निर्भीकतासे निबाहें । हम किसीको मारनेके लिए तैयार नहीं हैं, लेकिन मरनेको तो तैयार हैं। अपने रवैयेसे आपको सरकारको इस बातकी प्रतीति करा देनी है कि इसके लिए आपको मारना या आपका दमन करना पाप है और यह ऐसा काम है जो नहीं किया जा सकता । जबतक आप दूसरोंका विश्वास नहीं करते, दूसरे आपका विश्वास नहीं करेंगे। तो मेरा अनुरोध है कि आप दूसरोंका विश्वास करें। ऐसा करके आप अपने शासकोंके मित्र बन जायेंगे। लेकिन चाहे आप उनके मित्र बनें या न बनें, हम भारतीयोंको अपने मनमें अपने शासकोंके प्रति किसी प्रकारका घृणाका भाव नहीं रखना है। आपको दूसरे पक्षके प्रति किसी तरहका घृणाका भाव रखे बिना स्वराज्यके लिए लड़ना चाहिए। अगर में भारतीयोंको इतनी सी बात समझा सकूँ तो उन्हें स्वराज्य मिल कर रहेगा। मैं आपके भीतर यह विश्वास जगाना चाहता हूँ कि मरनेमें मारनेसे ज्यादा बहादुरी है । मेरा यह भी अनुरोध है कि जबतक युवराज आपके बीच रहें, आप उनका बाल भी बांका न करें, और न सरकारी अधिकारियों का ही कोई नुकसान करें । अगर सरकार हम भारतीयों को मारना चाहे तो उसे मारने दीजिए, क्योंकि हम १. देखिए " पत्र : गंगाधर राव देशपाण्डेको ", ८-१०-१९२१ के पूर्व । Gandhi Heritage Portal