४९० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय इस प्रणालीकी निन्दा करता हूँ इससे आप यह न समझें कि मैं अंग्रेज-जातिके लोगोंको निन्दनीय मानता हूँ । धर्मतः मुझे अंग्रेजोंसे भी वैसा ही प्रेम करना चाहिए जैसा हम अपने-आपसे करते हैं । इस संकटके समय यदि मैं इसे सिद्ध करनेका प्रयत्न न करूँ तो यह ईश्वरसे मुँह मोड़ने जैसा ही होगा । पारसियोंके सम्बन्धमें मैंने जो कुछ कहा है, उसका एक-एक शब्द मेरे हृदयसे निकला है। हिन्दू-मुसलमान यदि प्राण देकर भी पारसियोंके प्राण और सम्मानकी रक्षा नहीं करेंगे तो वे अपने-आपको स्वतन्त्रताके अयोग्य सिद्ध करेंगे। हालमें ही उन्होंने अपनी उदारता और मित्रताका परिचय दिया है। मुसलमानोंपर तो उनका विशेष उपकार है, क्योंकि संख्याकी दृष्टिसे देखें तो पारसियोंने खिलाफत के लिए अनुपाततः मुसलमानोंसे अधिक धन दिया है। जबतक हिन्दू और मुसलमान इसके लिए खुले रूपसे हार्दिक खेद प्रकट न करेंगे तबतक मैं उन पारसी स्त्री और पुरुषोंकी कातर आँखोंसे आँखें नहीं मिला सकूंगा जिनके बीच मैं अभी १७ तारीखको गया था । इसी तरह जबतक हम हिन्दुस्तानी ईसाइयोंके साथ किये गये दुर्व्यवहारके लिए प्रायश्चित्त नहीं करेंगे तबतक मैं पूर्व आफ्रिकासे लौट आनेपर श्री एन्ड्रयूजसे भी आँखें नहीं मिला सकूंगा । अपने भाई और बहनोंकी तरह इनकी भी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है । उन्होंने या पारसियोंने आत्मरक्षार्थ अथवा बदला लेनेके लिए हममें से कुछके साथ जो बर्ताव किया है, उसका हमें ख्याल नहीं करना चाहिए । आप लोग अनायास ही समझ ले सकते हैं कि उन लोगोंको मुख्यतः अधिकसे- अधिक राहत पहुँचाना मेरा कर्तव्य है जिन्हें मेरे निमित्तसे उद्भूत इस हलचलका शिकार बनना पड़ा है। मेरी प्रार्थना है कि हर हिन्दू और मुसलमान ऐसा ही करे । पर किसीके लिए उपवास आवश्यक नहीं है । उपवाससे तभी लाभ होता है जब आत्माकी तीव्र इच्छा और प्रार्थनाके बाद उसकी आवश्यकता महसूस की जाये। मैं चाहता हूँ कि हर हिन्दू और मुसलमान अपने घर जाकर ईश्वरसे क्षमाकी प्रार्थना करे और सच्चे हृदयसे आहत समुदायोंको मित्र बनानेका प्रयत्न करे । मेरे साथ काम करनेवालोंसे मेरी प्रार्थना है कि वे मेरे लिए एक भी सहानुभूतिका शब्द न कहें। मुझे न इसकी जरूरत है, न मैं इसके योग्य हूँ । पर मेरा अनुरोध है कि वे उद्दण्ड किस्मके लोगोंपर काबू पानेका अथक प्रयत्न करते रहें। यह संघर्ष सचमें 'खाँडेकी धार' का-सा संघर्ष है । इसमें झूठ और प्रपंचके लिए कोई गुंजाइश नहीं। हम अपना हृदय निर्मल बनाकर ही इस दिशामें कोई प्रगति कर सकते हैं। । मुसलमान भाइयोंसे मैं खास तौरसे दो शब्द कहना चाहता हूँ । खिलाफतको मैं एक पवित्र उद्देश्य समझता हूँ | मैंने हिन्दू-मुस्लिम एकताका प्रयत्न किया है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि इसके बिना भारत स्वतन्त्र नहीं रह सकता और हमारे लिए एक- दूसरेको सहज शत्रु समझना ईश्वरके अस्तित्वको अस्वीकार करना होगा। मैंने अली- बन्धुओंको गले लगाया, क्योंकि मैं जानता हूँ कि वे सच्चे और खुदासे डरनेवाले आदमी हैं। मैंने सुना है कि गत दो दिनोंकी संहार-लीलामें मुसलमानोंने आगे बढ़कर हिस्सा लिया था । इससे मेरे मनको गहरी चोट लगी है। मैं प्रत्येक मुसलमान कार्य- Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५२२
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