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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 21.pdf/५२४

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२०१. अपील : बम्बईके मवालियोंसे बम्बईके मवालियोंसे [२० नवम्बर, १९२१ ] मैंने यह समझकर सबसे बड़ी भयंकर गलती की कि असहयोगियोंने आप लोगोंको प्रभावित कर दिया है, और आप लोगोंने नैतिक दृष्टिसे अहिंसाकी आवश्यकता भले न समझी हो, पर उसका सापेक्ष मूल्य, और राजनीतिक महत्व अवश्य समझ लिया है। मेरी यह धारणा हो गई थी कि आप लोगोंने अपने देशके हितोंको इतना अवश्य समझ लिया है जिससे आप कुछ ऐसा काम नहीं करेंगे कि आन्दोलनको हानि हो; और आप लोग अपने निम्नतम मनोविकारोंके वशीभूत न होंगे। पर मुझे यह देखकर मर्म- वेदना हो रही है कि आप लोगोंने जनताकी जागृतिको लूट-खसोट और अन्य अत्यन्त कुत्सित वासनाओंकी तप्तिका साधन बना लिया है। आप लोग अपनेको हिन्दू कहते हों या मुसलमान, ईसाई कहते हों या यहूदी अथवा पारसी, आप लोगोंने अपने धार्मिक हितोंको भी नहीं समझा है और उनकी भी हानि की है। मैं जानता हूँ कि मेरे कुछ मित्र कहेंगे कि मैं मानव-स्वभावको नहीं समझता । यदि मुझे विश्वास हो जाये कि यह आरोप सही है तो मैं कहूँगा कि मैंने अपराध किया है और तब मैं सामाजिक कार्योंसे अपने आपको अलग कर लूंगा और मानव-स्वभावकी समझ अपने अन्दर पैदा करनेके बाद ही उनमें भाग लेना शुरू करूँगा । पर मैं यह जानता हूँ कि दक्षिण आफ्रिकामें मुझे हिन्दुस्तानी मवालियोंतक को नियंत्रित करनेमें कोई कठिनाई नहीं हुई थी। इस सफलताका कारण यह था कि जहाँ मैं स्वतः नहीं पहुँच सकता था, वहाँ सहायक कार्यकर्त्ताओंके जरिये अपनी बात अवश्य पहुँचा देता था । परन्तु मैं देखता हूँ कि आप लोगोंतक हम लोग नहीं पहुँच पाये हैं। मैं यह नहीं मान सकता कि धर्म और देशकी पवित्र पुकारका आप लोगोंपर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता । देखिए कि आप लोगोंने क्या कर डाला है ! हिन्दू और मुसलमान मवालियोंने पारसी मन्दिरोंकी पवित्रता भंग की है और इस प्रकार पारसी मवालियोंके लिए भी रास्ता खोल दिया है कि वे आपके धार्मिक स्थानोंकी दुर्गति करें । चन्द पारसियोंने युवराजके स्वागतमें सम्मिलित होना उचित समझा, सिर्फ इसीलिए हिन्दू और मुसलमान मवालियोंने अपने सामने पड़नेवाले हरएक पारसीकी फजीहत करना अपना कर्त्तव्य समझा। नतीजा यह हुआ कि पारसी मवाली भी हिन्दू और मुसलमानोंके साथ इसी तरह पेश आने लगे हैं। निश्चय ही, पारसी मवालियोंको उतना दोषी नहीं माना जा सकता। सभी हिन्दुओं और सभी मुसलमानोंकी बात तो दूर रही, अधिकांश हिन्दुओं और मुसलमानोंतकने सख्ती के साथ विदेशी वस्त्रोंका परित्याग नहीं किया है। लेकिन १. यह अपील इसी तिथिको एक पर्चे के रूपमें जारी की गई थी; देखिए नवजीवन, २४-११-१९२१ । Gandhi Heritage Portal