मेरी आत्माको राहत दी। अगर आदमीके हाथों अपनेको मरवा डालना मेरे लिए उचित नहीं, तो जबतक मेरी अर्जी प्रभुके यहाँ मंजूर न हो तबतक अनशन-व्रत लेकर मुझे ईश्वरसे यह प्रार्थना करनी चाहिए कि ईश्वर मुझे उठा लें। मुझ जैसा दिवालिया और कर भी क्या सकता था ? निर्दोष जनतामें अपनी साखका मैं भरोसा नहीं कर सकता। १७ तारीखको उस साखके बलपर मैंने खुद ही जनता के सामने जो हुंडी पेश की थी उसको जनताने स्वीकारनेसे इनकार कर दिया — मेरी बात माननेसे इनकार कर दिया।[१] अब तो मुझे हर हालत में खोयी हुई साख फिरसे जमानी थी या उसकी कोशिश करते हुए मर-मिटना था। अब मैं बस ईश्वरका ही एक सहारा ले सकता था, जिससे वह अपना काम मुझसे करवानेके लिए मेरी उठी हुई साखको फिर जमाने में मेरी मदद करे। और ऐसा करनेका एक ही उपाय दिखाई दिया — यह कि मैं अपनेको अधिकसे-अधिक विनम्र बनकर उसके सामने साष्टांग पड़ जाऊँ और उसका दिया अन्न खानेसे इनकार करूँ। मुझे हजारों तरहसे अपनी सच्चाई उसपर प्रकट करनी चाहिए और उससे यह प्रार्थना करनी चाहिए कि अगर मैं तेरा काम करनेके लायक साबित न होऊँ तो मुझे वापस बुला ले और मेरी योग्यता और अपनी इच्छाके अनुसार नये सिरेसे मेरा निर्माणकर। और इसलिए मैंने अनाहार व्रत लिया है। अब साथियोंको चोटें लगी हैं या उपद्रवकारियोंको चोटें लगी हैं, खबरें सुनकर कि 'मेरे मेरा चित्त अस्थिर नहीं होता। मेरा तो एकमात्र सहारा मेरी निजी अहिंसा ही है। अगर वह असर नहीं कर सकती, तो मुझे उसके लिए चिन्ता करना उचित नहीं। भारतके दूसरे भागों में हजारों लोग मरते हैं। उनकी मृत्युसे मेरे हृदयको दुःख होता है; पर उनके लिए मैं चिन्तित नहीं होता। उसी प्रकार इस मामलेमें भी, जब कि मैं जो कुछ जानता हूँ वह सब कर चुका हूँ, मेरा चिन्तित और व्याकुल होना व्यर्थ ही है। इस प्रकार यह उपवास मेरे लिए प्रायश्चित्त, आत्मशुद्धि और भूल सुधार सब-कुछ रहा है। यह कार्यकर्त्ताओंको एक चेतावनी भी है कि इस संघर्षमें वे मेरे साथ खिलवाड़ न करें। इस युद्धमें सिर्फ वही लोग शामिल रहें जो सच्चे दिलसे अहिंसाके कायल हों। ऐसे सच्चे और पक्के कार्यकर्त्ता अगर इने-गिने ही होंगे तो भी यह लड़ाई बेखटके और बिना उलझनोंके चलाई जा सकेगी। पर कार्यकर्त्ता अगर नेक और सच्चे न हों, तो उनकी संख्या बहुत होने पर भी, उनसे इस आन्दोलनको हानि ही पहुँचेगी। और अन्तिम बात यह कि उपवास शीघ्र शान्ति स्थापित करनेका एक उपाय है। लेकिन यह अन्तिम बात तो एक व्युत्पन्न वस्तु है, जो प्रायश्चित्त, आत्म-शुद्धि और भूल सुधार के फलस्वरूप प्राप्त होती है। यह एक ईश्वर-प्रदत्त साख है।
कार्यकर्त्ताओ, सावधान !
उपवास तोड़ देनेके सम्बन्धमें मुझसे अनेक तरहसे अनुनय-विनय किया जा रहा है। कई लोगोंने तो मेरे दुःखसे दुःखी होकर खुद भी उपवास करना आरम्भ कर दिया है। मैं ऐसे सब सज्जनोंको यह जता देना चाहता हूँ कि वे भूल कर रहे हैं। मेरे लिए तो उपवास जरूरी हो गया था। मैं तो अपराधी था, दिवालिया था। मेरे लिए
- ↑ १. देखिए "भाषण : बम्बईकी सार्वजनिक सभा में", १७-११-१९२१।